अकेलापन भाने लगा

अकेलापन भाने लगा

जो नम आँखो को न पढ़ सके
वो दिल क्या खाक पढेंगे
जहाँ भी कदम रखेंगे
वहाँ राख कर देंगे।

तोहमत का सिलसिला बढाकर
खुद बैठ गया मुँह छिपाकर
सामने आने से झिझककर
देखो वार कर रहा पीठ पर।

खंझरो में जंग लगा हो जैसे
दर्द देता रहा जीवनभर
अब तो नासूर सा जख्म बना
देखो सामने से गुजरे पर मुँह छिपाकर।

आँखो को बंद ही रहने दे
न देख सकू तुझे ऐसे ही रहने दे
सामना तू कर न सकोगे
क्या होगा तुझे गूनाह गिनाकर।

आदत सी हो गई दर्द सहने की
दर्द के वगैर अंधेरा छा जाता है
निर्दोष होकर भी सजा सा लगता है
हाले दिल का हाल अब बेगाना लगता है।
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