बुलबुल

बुलबुल

चौबारों में चहकी चिड़िया देखी है।
लुटती बुलबुल बीच बजरिया देखी है।।

खूनी दरिंदों का ऐसा कोहराम हुआ।
घायल गुड़िया पे घात बेरहम हुआ।
काची काया पे चिंगरिया देखी है।
लुटती बुलबुल बीच बजरिया देखी है।।

नग्न हुई नज़रे मानस की देख इसे।
मर्यादा भंग करता दर दर देख इसे।
मेहखाने में बिकती बिटिया देखी है।
लुटती बुलबुल बीच बजरिया देखी है।।

पंख कटे बचपन से ये लाचार हुई।
इंसानी आंचल में ही शर्मसार हुई।
कटती गमले रोज टहनिया देखी है।
लुटती बुलबुल बीच बजरिया देखी है।।

कोख में मारा कभी उसे महखानों में।
हैवानियत से बहते आंसू आंखों में।
डर से छलकी रोज गगरिया देखी है।
लुटती बुलबुल बीच बजरिया देखी है।।
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