तन्हा सफर

तन्हा सफर

ताउम्र ऐसे सफ़र में रहा
तन्हाईयों के असर में रहा

बिखरने का डर नहीं था मुझे
हवाओं के ऐसे ही घर में रहा

सब अंजान चेहरों की भीड़ में
फकत एक चेहरा नजर में रहा

खतों पे लिखी थी गज़लें कई
महज एक मिसरा बहर में रहा

बातों ही बातों में लेते हैं नोच
गिद्धों के मैं ऐसे शहर में रहा

समंदर से मोती मैं लेने चला
मगर मैं तो उलझा लहर में रहा

कैसी जगह ले आयी हैं लहरें
अब इधर में रहा न उधर में रहा
❖❖❖

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu