इल्तिजा

इल्तिजा

बात लाजमी ही थी यूँ
सब सरेआम न कर
हाँ भूल जाऊँगा तुम्हे,
पर बदनाम तो न कर

यूँ किस्से पुराने सुनाकर
सफाई देने का बहाना न कर
मत कर मेरी इज्जत पर
खुद का तो खयाल कर

साथ किये वादों का
भी तो सम्मान कर
मेरा नहीं पर खुद
का तो सत्कार कर

समय था जब सँवारी थी
ज़िन्दगी मेरी चार चांद लगाकर
अब यूँ नजरअंदाज कर
इतना घना अंधकार तो न कर

सुलझा दी थी राहे कभी
ज़िन्दगी में साथ आकर
अब शहद सा नहीं पर
यूँ खंजर से वार तो न कर

मैं खुद भूल जाऊँगा तुम्हे,
यूँ बदनाम तो न कर
मैं खुद भूल जाऊँगा तुम्हे,
यूँ बदनाम तो न कर
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