मैं ठीक हूं ईश्वर

मैं ठीक हूं ईश्वर

मैं ठीक हूं ईश्वर!
तुम कैसे हो?
तुम्हारे लिए ही रोज-रोज
इस धरा पर लड़ाइयां होती हैं
खोजे जाते हो तुम मंदिरों और मस्जिदों में
कहां है तुम्हारा सृजन स्थल या कि जन्म स्थान
तुम ईश्वर हो तो-
क्या होना चाहिए तुम्हारे जन्म स्थान?
तुम्हारे माता-पिता, भाई- बहन और तुम्हारी संताने?
तुम्हारे नौकर- चाकर और तुम्हारी जाति और धर्म?
तुम्हीं तो मत्स्य भी बने
तुम्हीं नरसिंह रूप भी बने
तुम्ही पत्थरों में पूजे गए
तुम्हीं शिलाओं में सजे
तुम्हीं सूखे खंभों में प्रगट हुए
तुम्हीं बने सागर, बादल, हवा, आग, पानी और धरती
तुम्हीं बने सूरज, चांद और तारे
तुम्हारे ही रूप को तो मैं पूजता हूं रोज-रोज
फिर तुम्हारे लिए
तुम्हारे ही भक्तों में क्यों होता रहता है भेद- भाव और युद्ध
निरर्थक लड़ाइयां, वाद-विवाद और बेवजह हत्याएं और मारकाट
तुमने तो नहीं पैदा किए फसाद, जिहाद और
सवर्ण-दलित में भेदभाव
तुमने तो नहीं बनाई इतनी सारी जातियां
और इतने सारे विखंडित होती धर्म- संस्कृति और विचारधाराओं की लंबी फ़ेहरिस्त!
मैं तो ठीक हूं ईश्वर!
किंतु तुम कब ठीक होगे मेरे आराध्य!
मेरे ईश्वर! तुम तो शिलाओं में पूजित- अर्चित- वंदित मूर्तियों में कैद कब तक बने रहोगे?
मेरे कृष्ण, राम और हनुमान?
तुम तो सृष्टि के कण-कण में समाहित रहे हो
सुबह से शाम तक-
तुम हर गांव, शहर और देहात की गलियों में
उच्चरित होते रहे हो!
क्यों आज युद्ध उन्माद फैला है तुम्हारे लिए?
तुम्हीं हो अल्लाह और अकबर
राम और रहीम
कृष्ण और करीम
फिर न्यायालय / उच्च न्यायालय

राजनीति की रोटी सेकने वालों को
धर्म की ध्वजा को धारण करने वाले
लाखों-करोड़ों को क्यों नहीं सूझता?
कि राम तो सर्वत्र हैं
वह अल्लाह सर्वत्र है
फिर क्यों विवाद फैला पसरा है?
फिर क्यों अनैतिकता की अंधी दौड़ में
हम सब नास्तिकता और आस्तिकता का लबादा ओढ़े कब तक दौड़ते रहेंगे अनवरत।
थकान से बोझिल होने के बाद भी
अपने राम को पा लेने की इच्छा क्यों होती रहती है रोज-रोज?
और स्कूल- कॉलेजों की किताबों में पढ़ाई तो यही जाती है हमें कि ईश्वर सर्वत्र है
सब धर्मों में है वही एक ईश्वर
और वही राम, कृष्ण, गौतम, हनुमान, भरत, शत्रुघ्न, शिव, पार्वती, दुर्गा, लक्ष्मी-सब तो वही परमेश्वर है!
मेरे ईश्वर! कुछ तो बताओ! तुम अपने बारे में
तुम क्यों बोल नहीं सकते?
गीता, रामायण, कुरान, बाइबिल-
सबों में तो तुम्हीं दिखते हो
तुम्हारे विचार और दर्शन हैं
तुम हर क्षण सृष्टि के साथ जीवित रहते हो
नश्वर नहीं हो तुम
नहीं हो तुम अवतारी
या पुनर्जन्म की परिकल्पना के साथ
बार-बार जीवित होने वाले भी
नहीं हो तुम मंत्रों में या वेद की ऋचाओं में
अदृश्यवत्।
नहीं हो तुम यत्र-तत्र-सर्वत्र जड़ीभूत
या फिर किसी चेतना में अनुस्यूत या समादृत!
तुम नहीं हो मेरे जीवन के चिंतन और विचारों में
हर जगह
हर समा में बंधे हुए निर्वात रूप में प्रसृत
जीवन की जटिलताओं से भी असंपृक्त ;
तो तुम नहीं हो शायद!
नहीं हो पुस्तकों में कैद या चारों वेद, छह शास्त्र,
18 पुराण और 108 उपनिषद में उपस्थित
विविध श्लोकों के गुंजलक में
सृष्टि और विनाश के लय में
तुम्हारी कल्पनाएं होती हैं।
ईश्वर! तुम धरा पर अवतरित एक सूर्य हो!
जिनकी ज्ञान- रश्मियों में
हम देखते रहेंगे
जीवन के दंश और आरोह- अवरोह को
जीवन के सत्य और असत्य को
जीवन के घृणा और प्रेम को
जीवन के आय और व्यय को
और ईश्वर! तुमने हमें क्यों बांटा विभिन्न रूपों में
जो हमें बार-बार कुदेरते रहते हैं
हे ईश्वर! तुम्हीं ने सिखाये:
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”
और तुम्हीं ने दिए-
“कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करहिं सो तस फल चाखा।। “
का विराट शंखनादी स्वर
जिसने मानवतावाद को
अपने कर्म के प्रति सावधान किया है।
हे ईश्वर!
हम तुम्हें रोज-रोज विभिन्न रूपों में याद करते हैं।
रोज सोते- जागते, उठते- बैठते, काम करते,
खाते-पीते, बीमार पड़ते और स्वस्थ होते
हर वक्त समय- बेसमय-
तुम्हें याद करते हैं!
तुम्हारी महिमा का गुणगान करते हैं।
किंतु
तुम्हारे ही विभिन्न भक्तों की मंडलियाँ हमें-
( क्या से क्या बना देती हैं या बना देने पर आमादा हो जाती हैं)
मुझे लगता है- तुम्हारे होने या ना होने से
इस सृष्टि को कोई फर्क नहीं पड़ता है
तुम मंदिरों में रहो या मस्जिदों में
गुरुद्वारे में रहो या चर्च में–
नहीं बदल सकती इंसानों की जिंदगी
या मंदिर-मस्जिद के बाहर रहनेवाले
भिखारियों, चोरों, लुटेरों, गुंडों और बदमाशों की प्रवृतियां।
मैं अब जानने लगा हूं तुम्हारी आस्थाओं का सच
जो हमें डरा रही हैं सदियों से
जिसने सदियों से हमें घायल किया है
मन से, तन से और विचारधाराओं से भी
जिसने हममें ईर्ष्या-द्वेष और कलह की भावनाएं भरी हैं
जिसने स्वार्थ से जीना सिखलाया है
जिसने सिखाया है- सत्य और असत्य के बीच भेदभाव करना / पाप और पुण्य में फर्क करना
जिसने दी है हमें खुली छूट
कि अधिक से अधिक सत्कर्म करके
पुण्य कमाए जाएँ!
अधिक से अधिक ईश्वर के नाम जप कर
श्रेष्ठ और सर्वोत्तम बनें।
मैं योद्धा तो नहीं हूं
नहीं हूं लोभी, कामी, क्रोधी और ईर्ष्या से वशीभूत
कि दूसरों का हक/ धन हड़प सकूं!
हे ईश्वर! मुझे यह समझ नहीं आता
कि तुम किस तरह
उन चुराए गए फूलों से खुश रहोगे
जो सुबह-सुबह मेरे बगीचे से मुंह अंधेरे(बिन पूछे) कोई तोड़ ले जाता रहा है!
मैं चाह कर भी
उन पर नहीं गुस्साता
कि वे तो “देवो पर ही तो चढेगे “
चाहे मैं चढ़ाऊं या वे, जो हम से पहले
चढ़ा कर पुण्य के भागी बनेंगे
या वे उन फूलों की मालाएं बनाकर “बेचकर”
अपने बूढ़े मां-बाप की सेवा में निमग्न होंगे!
हे ईश्वर! मैं क्या करूं?
कुछ समझ में नहीं आता!
किंतु सर्वत्र दिखता हुआ अत्याचार, अनाचार,
हमें क्यों सावधान करने के लिए तत्पर दिखाई देता है और वे अदृश्य रूप में
हमसे यह सवाल पूछते हैं
उनके बारे में
जो ईश्वर के नाम पर
रोज-रोज अखबारों में
अपना बयान देते हैं, और बदलते हैं
और ईश्वर को भुनाने के लिए
नित नए नवीन तिकड़म की तलाश में
हमें हर पल नजर आते हैं!
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