मुझे नहीं पता था कि वह आखिरी मुलाकात है

मुझे नहीं पता था कि वह आखिरी मुलाकात है

डॉ. गंंगाप्रसाद विमल के प्रति यह संस्मरण,श्रद्धांजलि है।

मैं सचमुच उनके साथ पटना जाने के लिए तैयार था कुछ कहता, इससे पहले उन्होंने ही कह दिया “तुम्हारे विद्यार्थी तुम्हें बहुत पसंद करते होंगे न ! अपने विद्यार्थियों को उदास मत करना।” उन्होंने किसी तरह से मेरे चेहरे को पढ़ लिया था कि कहीं असमंजस की स्थिति है जो उनके निमंत्रण पर मैं सुनकर तुरंत जवाब नहीं दे रहा हूँ। इस समय हम दोनों साहित्य अकादमी गेट के ठीक सामने खड़े बातें कर रहे थे। वे दिसंबर के पहले सप्ताह में हो रहे पुस्तक मेले में शामिल होने के लिए पटना जाने वाले थे और मैं तीन दिन बाद अपने एम.ए.साहित्य के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए कालेज पहुंचने की सोच रहा था। उन्हें पहले ही बता चुका था कि परसों मेरी छुट्टी खत्म हो रही है। आप जानना चाहेंगे कि वह शख्सियत कौन थी, बेशक प्रोफेसर गंंगाप्रसाद विमल! हिन्दी साहित्य जगत के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. गंगाप्रसाद विमल मेरे गुरु ही नहीं, मेरे लिए उनका स्नेह पिता तुल्य भी था।

प्रोफेसर गंंगाप्रसाद विमल से पहली मुलाकात जेएनयू में तब हुई जब मैं पीएचडी करने के इरादे से वहां इंटरव्यू देने गया। मेरा इंटरव्यू करीब चालीस मिनट चला था। जिस चैंबर में इंटरव्यू चल रहा था वहां मौजूद विद्वानों में डॉ. मैनेजर पाण्डेय, डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल, डॉ. वीरभारत तलवार, डॉ. गंंगाप्रसाद विमल जैसे लोग बैठे हुए थे और उनके सवाल मुझे परखने के लिए लगातार एक

के बाद एक जारी थे। यह लिखित परीक्षा के बाद एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है जिसे क्वालिफाइ करने के बाद ही एम.फिल./पीएचडी में प्रवेश मिलता है। यही जेएनयू की परंपरा रही है। शायद यही बड़ी वजह रही है कि वहां प्रोफेसर ही नहीं विद्यार्थी भी चुने हुए आते हैं। मैं जब इंटरव्यू देकर चैंबर से बाहर निकला मेरे पुराने मित्रों में प्रमोद तिवारी (गुजरात विश्वविद्यालय), जयप्रकाश सागर (मशहूर फिल्मी गीतकार), अल्बिना शकील (एसएफआई) बेसब्री से मेरा इंतजार कर रहे थे। खैर यह पड़ाव भी मैंने क्वालिफाइ कर लिया। एडमिशन फीस जमा करने के बाद जब मैं बाकायदा वहां का (जेएनयू) स्टूडेंट बन गया तब भारतीय भाषा केन्द्र, जेएनयू के आफिस में डॉ. विमल जी से मेरी दूसरी मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे अपने चैंबर में बुलाया। जहां मेरे बैकग्राउंड को समझने की कोशिश करते हुए उन्होंने भविष्य की योजनाओं के बारे में लंबी बातें की। जेएनयू में उन दिनों एडमिशन लेना बहुत बड़ी बात होती थी लेकिन उनसे मिलने के बाद मैं
बहुत ही सहज हो गया था। शायद भविष्य को लेकर तमाम दुश्चिंताओं से मुक्त भी।

एम.फिल.कोर्स के दौरान डॉ. पाण्डेय, डॉ. अग्रवाल, डॉ. तलवार, डॉ. ओमप्रकाश सिंह और डॉ. विमल जी का सान्निध्य मिला। इसी समय में निकटता और घनिष्ठता के संबंध प्रगाढ़ हुए। एम.फिल. में मेरे शोध निर्देशक डॉ. विमल जी नहीं थे लेकिन शोध से लेकर साहित्य और लेखन के मुद्दे पर गंभीर चर्चा उन्हीं के साथ ज्यादा होती। उसी दौरान उन्होंने मेरे गीत, ग़ज़लों, कविताओं को पढ़ा भी सराहा भी लेकिन जाने क्यों उन्हें बार-बार लगता कि मैं अच्छी कहानियां लिख सकता हूँ जबकि आज तक कहानियों की ओर मुझमें कोई स्वाभाविक आकर्षण पैदा नहीं हुआ। उनकी जिद् पर मैने तीन कहानियां शुरुआती दिनों में एक के बाद एक लिखीं। मेरे सहपाठी नीरज भी हमारी बातों को गंभीरता से लेते थे और उनके निर्देश पर कहानियां जहां-तहां पहुंचा भी दिया करते। संयोग से वह तीनों कहानियां पुरस्कृत हुईं और डॉ. गंंगाप्रसाद विमल जी का भरोसा इस हद तक बढ़ गया कि उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि तुम इसी विधा के लिए बने हो। मेरे बार-बार पूछने पर कि आखिर वह कौन सी बात है जो उन्हें यह भरोसा करने का आधार देती है? एक बार उन्होंने कहा था कि ‘जो रचनाकार काव्य में कही जाने वाली कथावस्तु के लिए मानसिक और वैचारिक संघर्ष को जी सकता है वह कथा के लिए कथ्य आसानी से ढूंढ लेगा। जब तुम्हारा काव्य इतना कथात्मक है तो तुम्हारी कहानी में काव्यात्मकता अपने आप आ जाएगी। यही तो चाहिए। कहानी लिखने की परंपरा को छोड़ कर कहानी लिखो।’ वह जितनी आसानी से यह बातें समझा रहे थे, वह बातें उतनी ही सहजता से आज भी मेरी समझ में नहीं आईं।

एम.फिल. के बाद पीएचडी के लिए मुझे शोध-निर्देशक की जरूरत थी। मेरे सामने यह समस्या थी कि मै किससे कहूं कि वह मेरा शोध-निर्देशक बन जाए। किसी तरह से खबर उन्हें लग ही गई और उन्होंने मुझे बुलवा लिया। बिना नाराज हुए पंद्रह दिन में सिनोप्सिस तैयार करने को कहा। मैने “हिन्दी कविता में राष्ट्रवाद” पर काम करने का मन बना लिया था, सो उसी के अनुरूप शोध का एक खाका तैयार कर लिया और उनके सामने पेश कर दिया। वह मुस्कुराते हुए बोले “राष्ट्रवाद पर बहुत सारे लोग काम करते हैं तुम भाषा, छंद विधान और उसके काव्यशास्त्रीय अध्ययन पर काम करो।” इस दिशा में काम करना मेरे लिए लगभग असंभव सा था। मैंने कहा “सर मुश्किल होगी।” उन्होंने कहा “शुरू तो करो जहां दिक्कत आएगी तो मै भी सहयोग करूंगा।” मैं उनके मुस्कुराते हुए चेहरे को देख रहा था कि लेखन में मुझे आलोचना से उठा कर कहानी के साथ कर ही चुके हैं, अब राष्ट्रवाद से हटाकर शास्त्रीयता के महासागर में गोता खिलवाने की तैयारी में हैं। एक सप्ताह लाइब्रेरी में झख मारने के बाद मैंने लिखना शुरू कर दिया। मुलाकात होती और ढेर सारी बातें होती लेकिन उसका जिक्र नहीं होता। डेढ़-दो महीने तक मैं रोजाना कुछ काट-छांट करता और कुछ बढ़ाता, धीरे-धीरे मुझे भी उसमें एक खास तरह का रस मिलने लगा था। इन सब चक्कर में ढाई सौ पृष्ठ से ऊपर लिख चुका था। अचानक उन्होंने कहा कि “सोमवार को दिखाओ कि क्या काम किया? ” मेरा सारा हौसला रफूचक्कर हो गया। कमरे पर जाकर फटाफट उन ढाई सौ पृष्ठों से मतलब की चीज छांटी तो बीस पृष्ठों के साथ तयशुदा समय पर मिला। देखकर तो बहुत खुश हुए लेकिन मेरे सामने सवाल यह था कि ढाई सौ पेज से बीस पेज निकालने वाला दिमाग पूरी थीसिस के लिए कितने पेज लिखेगा, काटेगा, छांटेगा। वाकई यह कठिन परीक्षा थी। खैर सिनोप्सिस पेश करने के लिए टाईप कराने का उन्होंने निर्देश दे ही दिया। टाईपिंग के बाद उन्होंने दस्तखत कर दिए, अब पेश होने और क्रास क्वेश्चन का पड़ाव पार करना बाकी था। उन्होंने कहा जब भी सेंटर की मीटिंग बुलाई जाएगी उसमें रख दिया जाएगा। वह शोध प्रारूप जो तैयार किया गया था उससे संतुष्ट थे और निश्चिंत भी। उन्होंने आदेश दिया कि अब चैप्टर पर काम शुरू कर दूं।

एक दिन मुझे राजेंद्र यादव के यहां भेजा। निर्देश के मुताबिक मैं अपनी कहानी भी लेकर गया था। यह राजेंद्र यादव से मेरी तीसरी मुलाकात थी। कहानी दिखाने से पहले ही उन्होंने कहा “कहानी लाए हो? ” मुझे अटपटा लगा। यह कहानी विमल जी को पसंद थी और उन्हें पूरा विश्वास था कि इस कहानी को छपने से नहीं रोका जा सकेगा। राजेंद्र यादव जी के सवाल से मुझे यह विश्वास हो गया कि डॉक्टर साहब ने जरूर इस संदर्भ में उनसे सिफारिश की होगी। मैं कभी नहीं चाहता था कि कोई भी प्रकाशक या संपादक मेरी किसी भी रचना या कृति को किसी की सिफारिश पर प्रकाशित करे। निश्चित रूप से यह मेरे अहं पर चोट होती। दूसरी बात कि मैं हर हाल में डॉ. विमल जी को राजेंद्र यादव जी की तुलना में ऊँचा इंसान मानता था और यह कभी नहीं चाहता था कि इतने मामूली सी बात के लिए,खास तौर से मेरे लिए वह सिफारिश करें। राजेंद्र यादव जी ऊँचे दर्जे के लेखक थे पर विमल जी लेखक और इंसान दोनों ही ऊँचे दर्जे के थे। मैंने कहा “लाना भूल गया हूँ। मेरी इच्छा थी कि जान लूं कि आप कहानी में क्या चाहते हैं क्योंकि ‘हँस’ आप की ही चाल चलता है।” शायद उन्हें भी भान रहा हो कि मैं कहानी नहीं देना चाह रहा हूँ। पिछली दो बार की मुलाकातों में वह इतना तो पहचान चुके थे कि मैं शरमाता नहीं हूँ और जो समझता हूँ बेझिझक कहता हूँ। उन्होंने कहा “मेरी सलाह की कोई जरूरत नहीं है, खुद लिखकर दे दो छप जाएगी।” यह वाक्य सुनने, कहने और लिखने में जितना सरल है उतना निहितार्थ में नहीं था क्योंकि यह और कोई नहीं राजेंद्र यादव कह रहे थे। मैंने कहानी नहीं दिया।

डॉ. गंंगाप्रसाद विमल जी को करीब से जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि उन्होंने कभी किसी से उखड़ी हुई बात नहीं किया। अगर कोई बात नहीं जंचती तो बात का रुख बदल दिया करते थे। उनका यह स्वभाव दूसरों को तो कोई तकलीफ नहीं देता था लेकिन मुस्कुराते हुए चेहरे के पीछे जो संवेदनशील इंसान था उसके अंतर्मन को उनकी रचनाओं के माध्यम से पढ़ा जा सकता है। मेरी समझ से किसी को संवेदना के स्तर पर परखने के लिए उससे कविता लिखवाना चाहिए। कविता में कोई भी रचनाकार कितनी भी कल्पना की पेंगे मार ले लेकिन आकर अपनी जमीन पर ही टिकेगा। डॉ. विमल की एक कविता है “रूपांतर” जिसकी पंक्तियों पर गौर करें तो यहां भीतर की पीड़ा अभिव्यक्त होती दिखाई देती है –
रूपांतर
इतिहास
गाथाएं
झूठ हैं सब
सच है एक पेड़
जब तक वह फल देता है तब तक
सच है
जब यह दे नहीं सकता
न पत्ते
न छाया
तब खाल सिकुड़ने लगती है उसकी
और एक दिन खत्म हो जाता है वह
इतिहास बन जाता है
और गाथा
और सच से झूठ में
बदल जाता है
चुपचाप।

इस कविता की व्याख्या करने की जरूरत नहीं है। सब कुछ स्पष्ट है। जीवन की सार्थकता देने में है, यही तो भारतीय जीवन-दर्शन सिखाया जाता है लेकिन क्या यह भी सच नहीं है कि एक समय ऐसा भी आता है जब देने वाले को कुछ पाने की भी जरूरत होती है। वह जितने दिखाई देते थे उससे कहीं ज्यादा ऊँचे इंसान थे। यह बात बहुत सारे लोगों ने उनके होते हुए ही स्वीकार कर लिया था। यह भी सच है कि आदमी नेकी पर चलता हुआ ही ऊँचाई पर पहुंचता है लेकिन उसके लिए जीवन भर त्याग करना पड़ता है, उन्होंने तो अब जीवन ही त्याग दिया।

मेरा उनका साथ पीएचडी के शोध कार्य के पूर्ण होने तक नहीं रह सका क्योंकि जल्दी ही भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू में उनका कार्यकाल पूरा हो गया था। जिस दिन सेंटर से उनको विदा दी गई उन्हें देख मेरी आँखों से आंसू टपक गए। उन्होंने सीने से लगाते हुए कहा “भावुक नहीं होते। तुम्हें सेंटर की ओर से कोई सुपरवाइजर मिल जाएगा। यहां सभी लोग बहुत अच्छे हैं” और मेरे सिर पर हाथ फेर दिया। मैंने कहा मैं पीएचडी के लिए नहीं बल्कि यह सोच रहा हूँ कि “हमारा साथ क्या इतने ही दिनों का था?” उन्होंने तुरंत कागज निकाल कर अपना पता और फोन नम्बर लिखा और कहा “संडे को आकर घर मिलो।” मेरे चेहरे की उदासी को देखते हुए बोले “मैं इंतजार करूंगा।” मैं तयशुदा दिन उनसे मिला। वही स्नेह, वही दुलार वहां भी था। जब उनके घर से विदा लेते वक्त मेरी आंखों में फिर आंसू आ गए तो बोले “मैं कहीं दूर नहीं, यहीं हूँ। जब भी कोई जरूरत पड़े चले आना।” हमारा साथ दो दशकों तक रहा लेकिन आज फिर मिलने की इच्छा है, मैं कहां जाऊं। अब तो कालकाजी का 112, साऊथपार्क अपार्टमेंट भी मेरी तरह उदास हो गया है।
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