एक बेरोजगार का चाँद

एक बेरोजगार का चाँद

चाँद तू रात का मुसाफिर
तेरी मेरी क्या दोस्ती
तू अंधेरों का साथी
मुझे तो चाहिये रौशनी।।
क्या तूने कभी सोचा
मेरे लम्हे दर लम्हे कैसे बीते हैं
रौशनी की किरन किरन को तरसा हूँ
मेरे तो दिन रैन सभी रीते हैं।।
तू ईद का चाँद बन कर आया
कहीं पुलाव कहीं सिवइयाॅ लाया

मेरे घर के ठंडे सूने चूल्हे में
मैंने अरमानों को पानी में खूब पकाया।।
तू दूज का चाँद बन जाता है
तो दुनिया वाह वाह करती है
मेरे लिए तो सारे चाँद बराबर
जब पेट में भूख मरोड़े लेती है।।
मुझे इंतज़ार है उस चाँद का
जिसे रब ने मेरे लिए बनाया है
जाने कब वह किस्मत को बदले
कहे–तेरी नौकरी का संदेशा आया है।।
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