सुधार गृह

सुधार गृह

पकड़ो, पकड़ो भागने ना पाये। कि आवाज में सात से उन्नीस साल के बच्चों का समूह तितर-बितर हो गई। सारे झुग्गी के लड़के जुआ खेल रहे थे। पुलिस की गाड़ी और हवलदार की आवाज से सब लड़को में अफरा-तफरी मच गई। सावन की बारिश में गन्दी बदबू और सीलन भरी झुग्गी में कल्लू जाकर दुबक गया। उसने देखा कि आज बस्ती में रेड पड़ी थी। सुकेस की झोपड़ी के चारो ओर पुलिस खड़ी थी। कल रात को सुकेस का किसी बात पर झगड़ा हो गया था। तभी पर्दा हटा ओर सुकेस भी उसके पास आकर छिप गया। वह कल्लू से बड़ा था। चाकू निकाल कर धौस जमाने लगा। ओर उसने चाकू की नोक कल्लू के आस्तीन पर गड़ा दी। कल्लू तिलमिला उठा। गरीबी और भुखमरी में दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में कल्लू के माँ-बाप मजूरी पर जाते। और यह मौहल्ले के बच्चो के संग गलत संगत में पड़ गया था। कल्लू ने आव देखा ताव उसका चाकू उसी की घोप कर भाग गया। भागते हुए पुलिस के हत्थे चढ़ गया।
इधर घायल सुकेस को पुलिस ने धरकर अस्पताल पहुँचा दिया। कल्लू की उम्र महज नौ साल की थी। तो उसे सुधार गृह भेज दिया गया। वहां कल्लू को नया माहौल मिला। लेकिन वहां भी उसके साथ कैदियों की तरह व्यवहार किया जाता। वहाँ के वार्डन ने कल्लू को को वहां आने का कारण पूछा-“क्यो बे तू किस जुर्म में आया है?, “साब मैंने कुछ नही किया, सब सुकेस का करा धरा है।, “अबे कुछ नही किया, तो क्या यहाँ छुट्टियां मनाने आया है। कहकर संचालक ने एक गंदी सी गाली बकी।
कल्लू की मासूमियत तो अब तबे पर पड़े पानी की तरह भाप बनकर उड़ चुकी थी। कल्लू को वहाँ का माहौल जरा भी अच्छा नही लगा। तभी सुधार गृह के इंस्पेक्टर ने देखा। कि आज तो सभी सोला से अठारह साल के बच्चे बचे हैं। वहां कल्लू ही उन्हें सबसे छोटा दिखाई दिया। पास बुलाकर बोले-“बेटा तेरे तो अभी पर भी नही निकले, इतनी ऊँची परवाज भरने चला। तभी घर से फोन बज उठी
।, “तुमने कहॉ था न, कि आज एक नौकर की व्यवस्था कर दोगे? , “क्या हुआ, देखता हूँ, कहते हुये इंस्पेक्टर ने फ़ोन काट दिया। कल्लू को देख बोले-“अरे सुन तू कल सुबह मेरे साथ घर चलना, थोड़ा जरूरी काम है, कर देगा ना, आँखे दिखाते हुए इंस्पेक्टर बोला। कल्लू ने डर से हामी भर दी। पहली बार वह उन गंदी बस्तियों से बाहर निकला था। गुनाहों के देवताओं से अब उसका परिचय तो हो चुका था। रात भर सो न सका। सुबह की नई किरण क्या उम्मीद लेके आएगी किसे पता। बड़े से बंगले पर बड़े-बड़े गेट भव्य ईमारत घर के अंदर बड़े-बड़े दो बुल डॉग

देखकर वह सहम गया। इतना भव्य मकान इस दुनियां में भी हो सकता है। यही सोचकर वह काल्पनिक दुनियां में खो गया। तभी कुत्ते के भोंकने की आवाज से कल्लू की निंद्रा भंग हुई। उसके पाँव थर-थर कॉप रहे थे। इंस्पेक्टर की कड़क आवाज उसके कानों पर पड़ी।, “उधर क्या देख रहा है? , चल जल्दी इधर आ, सहमा सा कल्लू फ़टे कपड़े में बरामदे में जाने की हिम्मत ना जुटा सका। फिर वह कड़क आवाज कल्लू के कानों पर पड़ी।, “सुनाई नही देखा क्या तेरे को? अब तो कल्लू की बाकी बची हिम्मत भी पस्त हो चुकी थी। आँखों से झर-झर आंसू बह निकले। आज ना जाने किसका मुँह देखा था। जो इस तरह मुझे यहां आना पड़ा। इससे तो वहीं की गालियां और मार सह लेता। तभी उसने देखा कि अदंर से एक ममतामयी मूरत सी एक महिला ने उसे इशारे से अंदर आने को कहा। थोड़ी हिम्मत जुटाकर कल्लू अन्दर की ओर आया! “क्या नाम है तेरा?, “जी जी, कल्लू, “सुनो क्या तुम्हें और कोई नही मिला जो इसे ले आये, ये मेरे किस काम का, जरा सा तो है।, “अरे तुम इसकी उम्र पर मत जाओ, यह अपराधी हैं, चाकू बाजी और ड्रग्स रखने के इल्जाम में पकड़ा गया है, सारा काम आँखों के सामने ही करवाना, अभी ऊपर बताया नही है, ऊपर तक बात गई तो लेने के देने पड़ जायेंगे। कहते हुए इंस्पेक्टर साब अंदर की ओर चले गये। “ले पहले बैठ के चाय बिस्किट खाले। कल्लू को वह किसी जहर की तरह नजर आ रहे थे। आज इतने दिनों बाद अचानक माँ की याद सीने में उबाल मारने लगी। बोला, “मैडम जी, साब मुझे यहाँ क्यों लाये हैं?, “अरे मुझे काम के वास्ते एक छोरा चाहिए था, इसलिए।, “क्या काम करना होगा।, अभी तू खाले फिर आराम से समझाती हू। एक अपनेपन की आस उस मैडम के शब्दों में प्रतीत हो रही थी। उसने झट से चाय उठाकर मुँह को लगाई। चाय गर्म थी उसका मुँह जल गया। आखों में पहले से ही आंसू भरे थे, चाय से जले मुँह के दर्द की तड़प भी उन्हीं आँसुओ के साथ बह निकली तभी इंस्पेक्टर साहब आकर बोले, देख बे, तेरी मालकिन को जब तक जरूरत है, तब तक रहले, फिर तुझे वही वापस जाना होगा। जी साब कहते हुए कल्लू ने हामी भरी। उसने देखा की इंस्पेक्टर उसकी और नजरे गड़ाकर जीप में रवाना हो गए। अब थोड़ी भूख मिट चुकी थी। वह दलान को निहार रहा था। सुन्दर भव्य नक्शाकारी बड़े-बड़े फानूस उसे सपनो की दुनिया सा प्रतीत हो रहा था। तभी मैडम की आवाज उसके कानों पर पड़ी। “सुन अपनी खोली देख ले, वही रहना आराम से, कल्लू अनजाने भय से भयभीत होते मालकिन के पीछे चल पड़ा। कुछ ही दूरी पर सुंदर सी खोली बनी थी।
ताला खोल मालकिन बोली, “तुझे अब यही रहना है।
“कितने दिन रहना है, ओर क्यो रहना है?
“अरे अभी से तेरी ज़बान चलने लगी! आज ही आया हैं, बता दूँगी। मालकिन के शब्दों से वह घबराकर खामोश हो गया।,
“देख अपने कपड़े इस अलमारी में रख लेना।,
“लेकिन मेरे पास तो कोई कपड़े नही हैं, यह तो सुधार गृह के कपड़े है, वह भी पुराने।
तभी मालकिन ने आवाज लगाई। तारा को बुलाकर उसको हिदायत दी कि कल आते समय दो, तीन जोड़ी कपड़े ले आना। आज कल्लू को इस बंगले पर आकर चालीस दिनों से ऊपर हो गए थे। कल्लू का काम दोनों कुत्तो को नहलाना घुमाना आदि। पहले तो वह डरता था। लेकिन बच्चो के स्पर्श को तो जानवर भी समझते हैं। अब वह उन दोनों का दोस्त बन गया था। मालकिन के अपनत्व ने उसके अंदर एक सुखद ममता का संचार उत्पन कर दिया था। वह समय से उठकर अपना काम कर्तव्य निष्ठा से निभाता। मालकिन समय रहते उसे अक्षर ज्ञान भी सिखाती। लेकिन कल्लू को रह-रह कर माँ की याद भी सताती। सोचता कि एक दिन भी माँ-बाप का कोई संदेश नही आया कि बच्चा कहॉ है? किस हाल में है? वह अपने को लावारिस ही
समझने लगा था।
साब बड़े ही कड़क ओर रोबीले थे। वह एक दिन मालकिन से पूछ रहे थे।
“क्या यह लड़का तुम्हारे बताए अनुसार काम करता है?
मालकिन ने कहा-“कच्ची मट्टी का ढेला है, जैसे ढालो ढल रहा है, मुझे इससे कोई शिकायत नही है।
इसे पंद्रह दिनों तक और रख लो। अगले महीने अधिकारी आ रहे हैं, तब इसे भेजना ही पड़ेगा। इतने दिनों तक इस फ्री के नौकर से तुमने अपने अनुसार सारे काम करवा लिए, इससे ज्यादा क्या उम्मीद रखोगी मुझसे!
साब की बातों से कल्लू की आँखे नम हो गई। यहाँ उसे किसी स्वर्ग की धरती जैसा अनुभव होता। वो बदबू दार कीचड की गलियां सोच कर ही वह घबरा जाता। यहाँ रहकर रोज कुछ शब्दों को सुन उसे थोड़ी बहुत अंगेजी भी समझ आने लगी थीं। लेकिन किस्मत के फेर को कौन बदल सका है। वह रातभर सो न सका। तो सुबह देर से उठा मालकिन ने पूछा,
“क्यों रे आज क्यों नहीं उठा?, देख टॉमी भुल्लर दोनों के नाम लेकर कितने भौंक रहे हैं! जा पहले जाकर उन्हें घुमाला, फिर चाय मिलेगी!
धुंधलाती आंखों से दोनों के गले में पट्टे डालकर उन कुत्तों को घुमाने निकल पडा! सुबह की नौकरी जो ठहरी। बिना मजूरी की। दिन में हिम्मत जुटाकर दरवाजे पर खड़ा हो गया।
दरवाजे पर खड़ा देख, मालकिन ने पूछा,
“कुछ चाहिए तुझे? इतने दिनों से रह रहा है, मैंने तुझे आज तक नहीं पूछा, कि तूने क्या गुनाह किया था?
“मालकिन मेरा कोई कसूर नहीं था, मेरा कसूर यही था! कि मैं गंदी बस्ती में पैदा हुआ और वहां के माहौल में बड़ा हुआ। थोड़ा बड़ा हुआ तो झुग्गी के बच्चों के साथ जुआ खेलने लगा और 1 की चार बनाने लगा। उस दिन किसी को खबर मिली कि सुकेस के यहाँ अफीम, गांजा, चरस का काम होता है। तभी बस्ती में पुलिस आई मुझे लगा कि पुलिस हमें पकड़ने आ रही है। मैं घर में छुप गया, तभी थोड़ी देर से सुकेस हाथ में पन्नी लिए मेरे पास मेरे घर घुस आया और बोला, “इसे तू अपने घर में छुपाले! मैंने मना किया तो उसने मुझे चाकू निकालकर धमकाने लगा। मुझ पर चाकू गड़ाने लगा। मैने अपने बचाव के लिए उसका चाकू छीनकर उसे मार तो खून निकलने लगा। मैं घबराकर बाहर की ओर भागा खून से सने कपड़े देख पुलिस ने मुझे दबोच लिया। मुझे बाद में सुधार गृह भेज दिया।
एक बात बता तुम बस्ती के बच्चों का को क्या यही सब आता है? चोरी चकारी जुवा गाली-गलौज मालकिन के प्यार भरे शब्दों में थोड़ी डाट भरी थी।
क्या बताऊं मलकिन मैं तो उस कुएं का मेंढक था। जिसने बाहर की दुनियॉ देखी ही नहीं थी। सबसे बड़ा अभिशाप तो गरीबी है, गरीबी में इंसान जहां रहता है, उसी जगह का हो जाता है, वहां का वातावरण उसे उसी माहौल में डाल देता है जैसे देखता है इंसान वैसा बन जाता है।
“अरे तू तो बड़ी-बड़ी बातें करने लगा।
आपके पास रहकर जो सीख गया हूं। कल्लू मुस्कुराया।
अगले महीने सुधार गृह वापस जाना है।
हां मैंने भी सुना खामोशी से सर झुका कर कल्लू बोला, एक बात पूछूं मालकिन यह सुधार गृह में बच्चों को कैसे सुधारते हैं?
बेटा!
पहली बार मालकिन के मुँह से बेटा सुनकर कल्लू की आत्मा पुलकित हो गई। चेहरे पर गर्वित मुस्कान लिए बोला, बोलो ना माँ!
“अचानक कल्लू से मां का संबोधन सुन मालकिन का उसके प्रति छुपा प्रेम हो बाहर आने लगा। बोली, “बेटा दुनिया में विश्वास सबसे बड़ी दौलत है। तुमने मेरे यहाँ रहकर अपनेपन और विश्वास के अनुसार काम किया है, मैं तो तुम्हें अपराधी मानती ही नहीं ।
मगर कानून तो तुझे आज भी अपराधी मानता है। कानून की नजर में तो तुम आज भी अपराधी हो तुम्हें मुझे सुधार गृह भेजना होगा, वरना साहब की नौकरी को खतरा हो सकता है, “ठीक है, जैसे आप कहोगे चला जाऊंगा! वह बहुत उदास हो चुका था। सुबह साहब के साथ कल्लू सुधार गृह जाने लगा मालकिन बोली,
“सुनो क्या तुम्हें लगता कि कल्लू को सुधार गृह जाने की आवश्यकता है! इतने समय से वह यहां विश्वास के साथ काम कर रहा है।
“जानता हूं! पर कानून के अनुसार इसे वहाँ ले जाना ही होगा, मैं इसको वापस ले आऊंगा।
आंसू भरी आंखों से वह मालकिन को देख रहा था। मालकिन की आंखों में भय मंडरा रहा था। की कहीं फिर सुधार गृह में जाकर वह उन बदमाश बच्चों में रहकर अपराधी ना बन जाए। कल्लू का मन द्रवित हो रहा था।
वह इंस्पेक्टर से बोला, “साहब आप तो मुझे हमेशा के वास्ते अपने पास रख लो मैं विश्वास दिलाता हूं, कि पूरी जिंदगी इमानदारी से आपकी चाकरी करूंगा, वह भी बिना मंजूरी के, मालकिन के प्यार और अपनेपन ने मुझे सुधार दिया है, मुझे सुधार गृह मत भेजो!
इंस्पेक्टर ने प्यार से कल्लू के सिर पर हाथ रख कर कहा, “जानता हूं, वह भी नहीं चाहती कि तुम सुधार गृह जाओ और मैं भी नहीं, कानूनी कार्रवाई करके मैं तुम्हें वापस ले आऊंगा। उम्मीद की किरण से उसकी आँखे चमक उठी। कल्लू मालकिन को देख मुस्कुरा उठा।
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