हो चुकीं हैं आवाजें आजाद

हो चुकीं हैं आवाजें आजाद

वह
आ रहा है सबके बीच
महसूस हो गया
माहौल के मिजाज़ से
लोगों के चेहरों पे बदलने
लगे हैं रंग
बढ़ रही है छटपटाहट
कंपकंपा रहीं हैं आवाजें
थरथरा रहा है शोर भी
क्योंकि
फड़फड़ाने लगे हैं
वर्दियों में कैद कुछ उसूलधारी
जो कुछ देर के लिए
हो जाते हैं संवेदनहीन,
उसकी आंखों में
डूब चुकीं हैं संवेदनाएं
वह केवल खर्च करता है
उतने ही शब्द
जिनसे कायम रह सके
उसका तथाकथित अस्तित्व,
बना रहा है
पूरी जनता को अभ्यस्त, कि
मान ले नहीं है कोई दूसरा विकल्प
पी रहा है
सभी की आंखों की चमक
जिससे देख सकें
सब उसी की नज़र और नज़रिए से
और कुछ भी कहने के लिए
इस्तेमाल करें
उसी के आवंटित शब्द
वह वो चुका है
कुछ अदद शब्द और
बना दिया है भीड़ को गूंगा
वह चला रहा है
अपने ही तरीके से
हो चुकी शब्दमय भीड़ को
क्योंकि उसके शब्दों में

छिपा है तिलिस्म
और वह जानता है
बखूबी खेलना शब्दों से
मौन है भीड़
सोचती नहीं
न ही है देखती,
छा रही है धुंध
बिखर चुकीं हैं
आवाजें, दर्द और शोर
महसूस करने लगे हैं
कंकरीली ज़मीन को
माहौल में
बहती है गरमी पिघल कर
उड़ रहे हैं भाप बन कर
ढेरों लिजलिजे शब्द
बेचैन चेहरे और टांगों के हुजूम
बढ़ रहे हैं
काफ़ी तेज़ी से
उत्तेजित और
घबराए से
जंतर- मंतर की ओर
अब उनके पास हैं
अपने शब्द
अपनी चीखें
अपनी आवाजें
भर गए हैं हवा में, दिशाओं में
ढेरों बेख़ौफ़ शब्द
और दर्ज़ हो जाते हैं
अख़बारी हेडलाइंस में कि
आवाज़ें आजाद हो चुकीं हैं
डूब चुकी है भीड़ धुंध में क्योंकि
हो चुकीं हैं आवाज़ें आजाद,
आवाजें आजाद हो चुकीं हैं।
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