दर्द

दर्द

नाजुक सी जिंदगी को कुचल डाला बेदर्दी से
फिर मसल डाला न डर न भय रहा उसे अब
फूल सी बच्ची को फिर एक बार जला डाला

लाख पर्दे कर लो जमाने से निगाह गंदी है
जिनके, लूट लेते हैं अस्मत फिर बेदर्दी से
सजा-ए-मौत के इंतजार में रह जाते हैं

उनके पीछे कुछ लोग, रोज आंसू लुढ़कते हैं
गालों से उनके पर जल्लाद घूमते हैं जमानत पर
सामने उनके हर रोज खामोश आज सब हैं

मैं भी इस कदर हूं कि चाह कर भी रोक नहीं पाता हूं
कैसे कहूं दिल का दर्द आखिर, क्यों मिलता है
दरिंदों को जमानत यारों? आज भी बैठा रहता हूं

रोज जिल्लत सहता हूं, वो सब पर आज भी हंसते हैं
आंखों से जैसे कुछ पूछते हैं क्या मिला हमें
सजा दिलाकर, हम तो युं ही जमानत पर छूटते हैं

हां फिर जमानत पर छूटते है, वही फिर हम से ही पूछते हैं
आंखों ही आंखों में बेदर्दी, बेशर्मी से फिर हंसते हैं
जिन्हें जाना था वह तो चला गया जिंदगी से हमेशा के लिए

उनका दुख का जो इंतजार में है इन दरिंदों के
सजा पाने का, उनके दर्द को कौन समझे,
एक सवाल आज भी चिल्लाकर हर वो रूह पुछती है

कब तक जमानत पर छूटते रहेंगे और यूं ही घूमते रहेंगे
इंसाफ की खातिर नाजुक सी बच्ची के घरवाले घूमते रहेंगे तड़पते रहेंगे दिल ही दिल में हर पल मौत से लड़ते रहेंगे ❖❖❖

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