बेटियां अनमोल हैं

बेटियां अनमोल हैं

बीसवीं सदी अपने अंतिम दौर में थीI
वर्ष 1998 के अगस्त माह की चौदह तारीखI
समय : प्रातःकाल
स्थान : हमारा घर

रात्रि के स्याह आँचल में से सूर्योदय से पूर्व की लालिमा हल्के हल्के प्रस्फुटित हो रही हैI चारो ओर ओस के मोतियों की अनुपम छटा देखते ही बनती हैI मद्धिम वेग से चलने वाली ठंडी ठंडी हवाएं भी मधुर संगीत की सरगम जान पड़ती हैI ‘चीं’ ‘चीं’ करती चिड़ियों का चहचहाना एक प्रेमगीत-सा लग रहा हैI दूर कंही से आती रेलगाड़ी की ‘छुक-छुक’ की आवाज उस गीत में बराबर अपनी थाप दे रही हैI ऐसा लगता है मानो आज मेरे घर में खुशियों की बरसात होने वाली हैI

सुबह सुबह ही घर में पूरी गहमागहमी हैI आज हमारे परिवार में एक नए सदस्य का आगमन सम्भावित है, जिसके स्वागत के लिए सब छोटे-बड़े रात-भर जागते रहें हैं और बड़ी ही बेसब्री से ख़ुशख़बरी का इंतजार कर रहे हैंI

परम पिता परमात्मा की अपार कृपा से हर्ष और उल्लास का ऐसा वातावरण लगभग छः साल बाद बना हैI मेरी दादी जी तो रह रह कर रब्ब का शुकर मना रही हैंI घर की सबसे छोटी लेकिन नटखट सदस्या, छः साल की मेरी बेटी, “आकांक्षा” भी अपनी पड़-दादी के हाथों की उंगलियों को पकड़ कर अपनी चमकती हुई आंखों से कुछ कहना चाह रही हैI

जैसे ही यह समाचार मिला कि मेरी पत्नी ने एक पुत्री को जन्म दिया है, मेरे मुख से स्वतः ही निकला, “दाता! तेरा लाख-लाख शुक्र हैI ” स्वयं ‘मां सरस्वती’ साक्षात मेरे घर आईं हैं, इससे बड़ा वरदान और क्या हो सकता है?

मेरा मन बेकाबू होकर नाचने लगाI मैं अपनी पत्नी और नवजात बेटी से मिलने के लिए व्याकुल हो उठाI दोनों की सलामती के लिए ईश्वर से प्रार्थना कीI

घर में सभी सदस्य आपस में बढ़-चढ़ कर बधाइयां देने लगे और मेरी छोटी बहन की खुशी का तो कोई ठिकाना ही ना रहाI मेरे मुंह में मिठाई का एक टुकड़ा डालते हुए बोली, “वीर! देखले, मेरे ससुराल जाने से पहले ही मेरी जगह लेने वाली आ गई हैI “

कुछ समय बाद फिर वो पल भी आया जब एक नन्ही सी परी मेरे हाथों में आईI मखमल से भी ज़्यादा कोमल और बर्फ से भी कंही ज़्यादा श्वेत वह प्यारी सी गुड़िया अपनी छोटी छोटी आंखों से मुझे देखने लगीI खुशी के मारे मेरी आंखों से अश्रुधारा बहने लगीI

यह सब देखकर बेड पर लेटी मेरी पत्नी बोल उठी कि दूसरी लड़की के होने पर रो रहे हो क्या?

आंसुओ को रोकने के प्रयास में बंद की हुई भारी पलकों को जबरन उठाकर अपनी पत्नी की ओर देखा तो वो शरारत से मुस्कुराने लगीI उसकी बड़ी बड़ी चंचल आंखों की गहराई में खुशियों से लबालब मोतियों को मैंने साफ साफ देखाI कुछ कहने के लिए अपने होंठो को खोलना भी चाहा परन्तु नाकाम रहाI मेरे दोनों होंठ जैसे जादू के जोर से आपस में चिपक कर रह गएI वो भी बिना कुछ वोले चुपचाप मुझे ही निहार रही हैI ये कैसी अजीब सी कश्मकश है कि दोनों एक दूसरे को भीगी नज़रों से देख रहे हैं लेकिन बोल नहीं पा रहेI

फिर अचानक ही सैलाब-सा आ गयाI होंठ भी कांपने लगे और आँखे भी दगा दे गईंI हम दोनों की आँखों से आंसुओ की धारा तेजी से बाहर छलक आई मानो प्रेम की नदी में बाढ़ आ गई होI

तभी मम्मी की आवाज़ ने उस बाढ़ पर बांध का काम किया, “एह की? तुस्सी दोनों पागल तां नही हो गए हो? रोन्दे क्यों पय्ये हो? आजकल कुड़ियां, मुंडयां तो वीं वद नेंI “

शरमाते और सकुचाते हुए मैंने अपने आंसुओं को सहेजा और भरभराते हुए स्वर में बस यही कहा- “नहीं, मम्मी जी! लड़की के होने पर हम दोनों ही बहुत खुश हैंI दरअसल, मैं तो चाहता था कि लड़की ही होI “

“अच्छा जी! चंगी गाल्ल ए!! हुण सोचो कि गुड्डी दा नाम कौन रखेगा? ” मम्मी ने कहाI

मैंने तुरंत जवाब दिया, “नाम? नाम तो मैंने पहले ही सोच रखा हैI ”
इतना सुनते ही मेरी पत्नी ने लगभग विद्रोह भरे स्वर में कहा- “अपनी इस बेटी का नाम मैं ही रखूंगी; बल्कि मैंने तो रख भी दिया हैI “

मैं बोला, “ऐसे कैसे? मैं ही रखूंगाI “

मेरी बहन ने यह कर हस्तक्षेप किया कि “वीर! पहले भी आकांक्षा का नाम तुमने ही रखा था; इस बार भाभी रखेंगीI “

तभी मेरी सासु मां ने यह कह कर चुटकी ली कि “बच्चे का नाम तो बुआ रखती हैI “

मेरी बहन मुस्कुराई और बोली, “मैं अपना हक़ अपनी भाभी को दे रही हूँI “

लेकिन मैं अभी भी अपनी जिद पर अड़ा हूँI

वक़्त की नजाकत को देखते हुए मम्मी ने “वीटो” पावर का इस्तेमाल किया और हम दम्पति को आदेश दिया कि गुड़िया का जो भी नाम हमने सोच रखा है, उसे अलग अलग कागज पर लिखकर उन्हें दे दोI
आदेश का पालन हुआI

अब दो पर्चियां मम्मी के हाथों में आ गईंI पर्ची खोलने से पहले मम्मी ने स्पष्ट किया कि जो भी नाम ‘उन्हें ‘ पसन्द आएगा, वही फाइनल होगाI उपस्थित सब लोगों की उत्सुकता बढ़ गईI

सबसे पहले मेरी पत्नी द्वारा लिखी गई पर्ची को खोला गयाI उसमें लिखे नाम को पढ़कर मम्मी के होठों पर एक मुस्कान आ गईI
मुझे लग गया कि बस, यही नाम फाइनल होने वाला है; दूसरी पर्ची को खोलना तो अब औपचारिकता ही है और हुआ भी यहीI

जैसे ही मम्मी ने दूसरी पर्ची को खोला, उनके माथे पर गहन चिंतन की सलवटें सबको स्पष्ट दिखींI मैं समझ गया कि मेरा सुझाया नाम पसन्द नहीं आया हैI उस निर्णायक घड़ी में सभी सांस रोककर मम्मी के चेहरे की ओर एकटक देखने लगेI

मम्मी ने उस छोटी सी गुड़िया को अपने हाथों में लिया और कहने लगी, “वाह कुड़िये! तूं तां बड़ी भागां वाली ऐंI तेरे मम्मी-पापा ने तां तेरा इक्को ही नां रख्य्या ए “अनमोलI”
सभी लोगो ने तालियां बजाकर ‘अनमोल’ नाम पर स्वीकृति की मोहर लगा दीI

हम दोनों पति-पत्नी एक दूसरे को देखकर फिर मुस्कुराने लगे कि दोनों के जहन में अपनी बेटी का एक ही नाम था “अनमोल”I
और हो भी क्यों ना!!
बेटियां तो होती ही अनमोल हैंI

यँहा एक बात लिखनी तो मै भूल ही गया कि उस दिन उस अस्पताल में ग्यारह बच्चों ने जन्म लिया था, जिसमें से दस लड़के थे और एक हमारी ‘अनमोल’I क्योंकि “बेटियां अनमोल हैंI ” ❖❖❖

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