हिन्दी साहित्य का बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी : प्रो0 (डॉ0) छेदी साह

हिन्दी साहित्य का बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी :  प्रो0 (डॉ0) छेदी साह

हिन्दी साहित्य के साथ-साथ अंगिका भाषा के लब्धप्रतिष्ठ शिक्षाविद, सुविख्यात समीक्षक, कवि
एवं आलोचक डॉ. छेदी साह का उदय बीसवीं सदी के आठवें दशक में हुआ था ये इक्कीसवीं सदी के प्रारंभिक चरण में देश के शीर्षस्थ प्रगतिशील आलोचकों के बीच ख्याति एवं प्रतिष्ठा के व्यक्ति बन गये। इनका अध्ययन अनुशीलन दलित साहित्य सृजन एवं रचनात्मक गतिविधियाँ का दायरा विस्तृत है।               
         स्वाधीन भारत के तीन बड़े कवियों में से प्रथम कवि नागार्जुन की कविताओं पर इन्होंने जो निष्पतियाँ दी हैं, वे केवल निष्पक्ष एवं पारखी आलोचक ही दे सकते हैं। हिन्दी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘ भारतीय साहित्य : धाराएँ- अवधारणाएँ में डॉ. छेदी साह का उल्लेख करते हुए लिखा है-नागार्जुन की कविता के प्रसिद्ध
समालोचक डॉ. छेदी साह के अनुसार “ नागार्जुन ने राजनेताओं की स्वार्थपरता,   हिंसकता, उग्रता और कूटनीति की कटु आलोचना की है। नेताओं पर व्यंग्य करने तथा उनकी आलोचना करने में हिन्दी कविता में  नागार्जुन जैसा कवि विरल है। ”  
        इनके द्वारा प्रणीत मौलिक ग्रंथ ‘ नागार्जुन की कविता मूल्यांकन और परिव्यप्ति तथा ‘ हिन्दी साहित्य : सृजन और चिंतन ‘ है। जिसपर इनका एकाधिकार सा लगता है। ‘ नवागत ‘ तथा ‘ नव- अर्चना के स्वर ‘ इनके द्वारा सम्पादित काव्यकृतियाँ हैं। जिसमें विषय-संयोजन एवं काव्य- चयन की विविधता काबिले-गौर है। इनकी दो और मौलिक कृतियाँ प्रगतिवादी कविता और
भारतीय |संदर्भ ‘ और ‘ हिन्दी साहित्य की दिशा तथा अन्य  निबंध ‘ कथ्य और शिल्प की दृष्टिकोणों से सराहनीय हैं। इसमें इन्होंने जिस प्रकार से  दबे-कुचले और उपेक्षितों को आवाज दी है इससे
इनकी संघर्ष गाथा का बोध होता है। इन्होंने पराधीन भारत के अंतिम दशक से लेकर वर्तमान तक प्रगतिशील कवियों के व्यवस्था-विरोध तेवर को बारीकी से पेश किया है। इनके लेखन में
राजनीतिक सजगता के साथ सामाजिक कुव्यवस्था पर व्यंग्यात्मक स्वरों को संकलित कर सर्वहारा वर्ग की पीड़ा स्पष्ट रूप से झलकती है। ध्यातव्य है कि अपने अध्ययन, अनुशीलन और लेखन की सुदीर्घ अवधि में हृदयगत एवं समय / समाज सापेक्ष मनोभाव को व्यक्त करने की दिशा में डॉ. साह निरंतर साधनारत रहे। डॉ. साह द्वारा प्रणीत सद्यः प्रकाशित ग्रंथ ‘ हिन्दी साहित्य सृजन और चिंतन ‘ छात्रों एवं शोधार्थियों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इस ग्रंथ में प्रौढ़ और सारगर्भित

निबंधों का संग्रह है। इससे हिन्दी की आधुनिक कविता की समझ खुलती है। डॉ. साह ने अपने ग्रन्थ ‘ हिन्दी साहित्य : सृजन और चिंतन ‘ में लिखा है-अभिनव भारत के प्रथम राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति के उद्बोधक, राष्ट्रीय जागरण के वैतालिक और युगचेतना के सच्चे प्रतिनिधि साहित्यकार थे। वे भारतीय संस्कृति को वाणी देने वाले आदर्शवादी कवि थे। गुप्तजी के प्रभापूर्ण काव्य में अतीत का सुन्दर रूप वर्त्तमान को प्रेरणा का सक्षम भाव सौंपता है, ताकि कूव्यवस्था में छटपटाता हुआ वर्तमान कोई नहीं राह पा सके। ‘ रामायण ‘, ‘ महाभारत ‘ और ‘श्रीमदभागवदगीता’ जैसे स्थायी ग्रंथों ने हिन्दी साहित्य के अधिकांश कवियों को प्रभावित किया है और  हिन्दी के प्राय : सभी श्रेष्ठ कवियों ने उनके आभार को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया है।
इसका अतीत संस्कृति की पवित्र सलिला के तरह भव्यता का प्रकाश-स्तम्भ है . जिसमें विश्व कल्याण का अमृत छलकता रहता है।   ‘साकेत ‘ के राम हों या ‘ पंचवटी ‘ का लक्ष्मण, ‘ द्वापर ‘ के
कृष्ण हों या बलराम, गुप्त जी ने कभी भी अपने आदर्श को विलुप्त नहीं होने दिया। भारतेन्दु ने जिस खड़ी बोली की प्रस्तावना की और उसे परिपक्वता प्रदान करने का दायित्व आचार्य महावीर
प्रसाद द्विवेदी पर पड़ा। गुप्तजी द्विवेदी युग के कवि होने के नाते खड़ी बोली की पुष्टि के रचनात्मक आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण रचनाकार थे। श्रीगुप्तजी द्वारा प्रणीत ‘ जयद्रथ वध ‘, ‘ सैरंधी ‘ आदि रचनाओं की पृष्ठभूमि और प्रेरणा महाभारत के प्रसंग ही हैं। ‘ प्रदक्षिणा ‘ ‘ साकेत ‘ और ‘ पंचवटी ‘ इन तीन काव्य-ग्रंथों का मूल आधार रामायण है। राष्ट्रकवि गुप्तजी ने इन रचनाओं के अवसर पर अपने युग का भी ध्यान रखा है। ‘ साकेत ‘ हिन्दी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। निःसन्देह उनकी दोनों काव्य-संग्रह का शीर्षक ‘ उत्कर्ष ‘ एवं ‘ आसमाँ ‘ इनके सुकोमल मनोभावों एवं जीवन दर्शन को दर्शाता है। ‘ जिन्दगी ‘ शीर्षक कविता में डॉ. साह की ओजस्वी वाणी इस प्रकार है :-
जिन्दगी
उस छोटी दरिया जैसी है
जो सदा प्रवाहित होती
शुष्क मरुभूमि में
लुप्त हो जाती  है
जो अपने सौरभ को उड़ाता हुआ
एक दिन
पतझड़ हो जाता है।
”आसमाँ ” काव्य-संग्रह में इन्होंने लिखा है :-
         झोपड़ी के द्वार पर दीपक नहीं
         तो आसमाँ पर चाँद रहकर किया करेगा।
वस्तुत: उनकी अभिव्यक्ति भारतीय समाज में विषमता, भ्रष्टाचार एवं पूंजीवादी व्यवस्था को परिलक्षित करता है।
             उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में ‘ उत्कर्ष ‘, ‘ आसमाँ ‘ एवं ‘  हौ फुल ‘ इनकी अंगिका काव्यसंग्रह है जिसमें इनके कवि रूपकी पहचान मिलती है। इन काव्य-संग्रहों में डॉ. साह ने अपने मनोभावों को खुलकर अभिव्यक्त किये हैं तथा अंगिका भाषा के कवियों में अपनी एक अलग पहचान बनाई हैं। मानवीय संवेदना की दृष्टि से कविता का क्षेत्र व्यापक और गहरा होता है। इस संदर्भ में डॉ. साह का मत निश्चय ही अवलोक्य हैं-‘ चेतना के सुख-दुःख की अभिन्न सहचरी कविता से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं कविता हृदय की झंकृति है, मानसिक व्यापार नहीं। ‘
कवितांश उल्लेख है :-
      ‘दीप की लौ की’
       ‘हर थरथराहट में’
‘सुर मेरे होंगे संगीत। (‘उत्कर्ष ‘काव्य संग्रह.पू.सं .- १७)
हिन्दी एवं अंगिका साहित्य में इनके महत्वपूर्ण योगदान की सराहना करते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कृत वरिष्ठ कवि डॉ. शेरजंग गर्ग ने कहा कि डॉ. साह का नागर्जुन पर एकाधिकार-सा लगता है। इन्होंने डॉ. साह की आलोचकीय दृष्टि की प्रशंसा की है। हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. आदित्य प्रचंडिया ने डॉ. साह के योगदान को रेखांकित करते हुए लिखा है कि ‘डॉ. साह हिन्दी साहित्य जगत के लिए शलाका पुरुष के समान हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. साह के नाम और काम से कौन नहीं परिचित होगा। वे श्रेष्ठ विचारों आर्दशों के जीवित प्रतिरूप हैं। सही अर्थ में एकस्वच्छ हृदय, निर्मल मन के नेक इंसान हैं और उनके शुद्ध आचरण व्यवहार ने उन्हें लोकप्रिय बनाया है। उनके व्यक्तित्व में विलक्षण चुंबकीय शक्ति है जो सहज अनायास हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। उनकी सृजनशीलता का कोई सानी नहीं, वास्तव में उनकी उनमें गागर मूल्य चेतना के प्रति सजग रचनाधमी, श्रेष्ठ विचारक, चिंतक, शिक्षाविद, कवि, आलोचक, समीक्षक हैं। ‘
      इनके लेखन में राजनीतिक सजगता के साथ – साथ सामाजिक कुव्यवस्था पर व्यंग्यात्मक स्वरों को संकलित कर सर्वहारा वर्ग के दर्द की पीड़ा स्पष्ट रूप से झलकती है। सम्प्रति तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर पद से सेवानिवत्त हए थे। डॉ. साह का जन्म १ दिसम्बर १९५. को बिहार राज्य के भागलपुर जिला के अन्तर्गत बिहपुर सोनवर्षा में एक मध्य वर्ग परिवार में हुआ। डॉ. साह का बचपन से ही संघर्षशील जीवन व्यतीत करते हुए गरीबी एवं लाचारी को करीब से देखा समझा और जाना। फलतः इनके काव्य शैली जीवन को प्रतिबिम्बित करने में पूर्णत : सक्षम हैं। डॉ. साह अपनी सशक्त अभिव्यक्तियों के माध्यम से समकालिन हिन्दी साहित्य की भीड़ में अपना अलग नाम स्थापित करने में सफल रहे। आलोचना के अलावा कविता में भी तेजी से पहचान बनाई। इनकी रचनाधर्मिता हिन्दी साहित्य को युगों-युगान्तर तक प्रकाशित करता रहेगा। इनके दो सौ से अधिक आलेख अबतक राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं और आकाशवाणी भागलपुर द्वारा पचास से अधिक वार्ता प्रसारित हुए हैं। इन्होंने दलित साहित्य क्षेत्र में भी प्रभूत सृजन किया है। दलित साहित्य सेवा एवं समाज सेवा के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के कारण भारतीय दलित साहित्य अकादमी दिल्ली ने ‘ सदगुरु कबीर राष्ट्रीय
अवार्ड ‘ ‘ डॉ अम्बेडकर विशिष्ट सेवा अवार्ड ‘ एवं ‘ डॉ. अम्बेडकर नेशनल अवार्ड ‘ से उन्हें सम्मानित किया है। हिन्दी साहित्य की विधा आलोचना एवं काव्य-रचना के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य के लिए इन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद बिहार पटना द्वारा ‘ साहित्य सेवा सम्मान ‘ तथा अनेक साहित्यिक संस्थाओं से ‘ पुरस्कार ‘ तथा ‘ प्रशस्ति पत्र प्राप्त हुए हैं। दर्जनों पुरस्कारों एवं सम्मानों से स्पष्ट है कि डॉ. साह द्वारा प्रणीत साहित्य को हिन्दी जगत में काफी मान्यता मिली है। अन्ततः हिन्दी साहित्य के जाज्वल्यमान, प्रभापुन्ज, नीलिमानक्षत्र का सौन्दर्य, शुक्रतारा का तेज चन्द्रमा का शीतलता, चंदन का सुगंध, फूलों का सुकुमारता, मानवतावादी जिनके व्यक्तित्व की गरिमा एवं धरोहर रहा उस महामानव को आज उनके जयंती दिवस पर श्रद्धा एवं स्नेह का स्वर्णिम थाल
समर्पित करते हुए एवं ईश्वर से उनकी आत्मा की अपार शांति की कामना करते हैं। आपका असीम प्यार हमें याद आता रहेगा।

प्रो0 (डॉ0) छेदी साह व्यक्तिगत परिचय

जन्मतिथि:- 1 दिसंबर 1950,
पुण्य तिथि:- 07 सितम्बर 2018,
शिक्षा:- एम. ए. (हिंदी), पी. एच. डी.(1983), डी. लिट्. (1991)
शोध निर्देशन:- पी. एच. डी के उत्तीर्ण बारह शोधार्थी
पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन:- सौ से अधिक आलेख विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
रचना क्षितिज:-

  1. नागार्जुन की कविता मूल्यांकन और परिव्याप्ति, मीनाक्षी प्रकाशन, दिल्ली, प्रकाशन वर्ष-2002
  2. प्रगतिवादी कविता और भारतीय सन्दर्भ, मीनाक्षी प्रकाशन, दिल्ली, प्रकाशन वर्ष-2002
  3. हिंदी साहित्य की दिशा तथा अन्य निबन्ध, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली, वर्ष 2012
  4. आसमाँ कविता संकलन, संजय प्रकाशन, दिल्ली 2017
  5. हिंदी साहित्य सृजन और चिंतन’ संजय प्रकाशन, दिल्ली 2017
  6. उत्कर्ष कविता संग्रह रवीना प्रकाशन दिल्ली 2018
  7. हौ फूल आंगिका -कविता संग्रह रवीना प्रकाशन दिल्ली 2018
  8. संपादन :- नवागत (काव्य-संकलन)
  9. नव अर्चना के स्वर (काव्य-संकलन)
  10. आकाशवाणी प्रसारण :- प्रायः 50 से अधिक हिंदी वार्ताएँ, भागलपुर केंद्र से ।
  11. Resource Person:- प्रायः दस बार
  12. ग्रन्थ समीक्षा :- दस ग्रन्थ
  13. पुरस्कार/सम्मान:- बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना द्वारा ग्यारह हजार रूपये के सम्मान राशि सहित ‘साहित्य सेवा सम्मान’ से सम्मानित।
    स्नेही इंटरनेशनल क्लब, बेगूसराय, बिहार द्वारा 2100 रुपये की सम्मान राशि सहित ‘स्नेही इंटरनेशनल जनपदीय साहित्य सम्मान ‘ से सम्मानित।
    भारतीय दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा ‘डॉ अंबेडकर नेशनल अवार्ड’ से सम्मानित तथा देश की दो दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत।
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