मंदिर वहीं बनाएंगे

मंदिर वहीं बनाएंगे

कल सत्ता के गलियारों से,
नेताओं के दरबारों से,
एक हल्की सी चीख उठी,
अपना सर्वस्व लुटाएंगे,
पर मंदिर वहीं बनाएंगे।

थी ज़हर, ये फैली हवाओं,
कुछ बहका गई युवाओं में।
फिर, सपने भूले, अपने भूले,
वो जाल सियासत में झूले।
कह चले थे प्राण लुटाएंगे,
पर मंदिर वहीं बनाएंगे।

थे रक्त-गंध निर्दोषों के,
नभ में क्रंदन स्वर कोषों से,
वह धरती मां भी सिसकी थी,
वक्षों पर लाशें बिखरी थी।

वह क्षुब्ध सा भिक्षुक सोचा था,
जो सड़क किनारे सोता था,
“क्या पुरुषोत्तम भी नंगे हैं?
और अल्लाह भी भिकमंगे हैं?
जिनकी दुआ सब पे बरसते हैं,
वो भी आश्रय को तरसते हैं?
फिर व्यर्थ प्रार्थना करता था वो,
क्यों घर की याचना करता था वो?”

अनुभव ने उसे सिखाया फिर,
स्मृति ने पुनः दिखाया फिर,
कि ये खेल घिनौना सत्ता का है,
पीछे भेड़ों का जत्था सा है,
जो अंधी बहरी तुतली है,
साहब! ये नेताओं कि कठपुतली है।

लहू के स्तंभों पर निर्मित,
जुल्मों के कालिख से शोभित,
बन भी जाएं मंदिर-मस्जिद,
क्या राम वहांँ पर आएंगे?
या अल्लाह शक्ल दिखाएंगे?

मैं तो कहता उठ चलो अभी,
उन माँ बहनों से मिलो कभी,
इस खेल ने जिनको ग्रास लिया,
खुद नियति ने फिर उपहास किया।
गोदें रूठी, मेंहदी रूखे,
सपने सोए, आंसू सूखे,
गर मर्यादा को ताड़ सको,
नैनों में दृश्य उतार सको,
ज्यों खुद को सही बता दो तुम,
फिर मंदिर वहीं बना लो तुम।
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