नदिया के उस पार

नदिया के उस पार

चेहरे पे मुस्कान खिली

शहर से जो मेरी

बैलगाड़ी

गांव चली

मिट्टी की पगडंडी है

कच्चे हैं रास्ते

खेतों में लहलहा रही फसल

आसमां के नीचे बादल

बादलों के नीचे बसे हरियाली है

ठंडी ठंडी पुरवाई चले

दूर दूर तक नजर जो दौड़े

पंछियों की कतार उड़े

मन में खुशहाली है

बसंती फूलों की एक लहर चले

मेरे सपनों की भोर यहीं है

मेरे गमों की सांझ यहीं ढले

पल पल नई उमंग भर के

मन में

मेरे बैलों का जोड़ा संग मेरे

बजाते गले में बंधी घंटियां

नदिया के उस पार चले।

मीनल

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