मन की आवाज

मन की आवाज

यह शोर नहीं

मेरे मन की आवाज है

सुन सको तो

सुन लो इसे

इसे मैं तुम्हारे कानों तक

कैसे पहुंचाऊं कि

हवा न भी चले

तब भी तुम्हें पेड़ पे लटके

एक पत्ते की तरह हिला

पाऊं

जो कुछ कहना है

उसे लिखित में दूं या

पढ़कर सुनाऊं या

कहो तो एक गीत रच के

सुनाऊं

सुनकर भी अनसुना करो तो

क्या जो मेरी आपबीती है

वो सब तुम पर घटा कर

बताऊं

मैं जल रही और

तुम्हें मेरी पीड़ा का तनिक भी

आभास नहीं तो

क्या अब वह समय आ गया कि

मैं एक जलती लकड़ी लूं और

तुम्हें भी आग लगाकर

जलाकर दिखाऊं

लेकिन कोई प्रतिक्रिया

मत करना

मुझ पे टूट मत पड़ना

मेरी शिकायत कहीं दर्ज मत

करना

सुनवाई तुम्हारी भी नहीं होगी

तुम्हें भी आगे प्रताड़ित ही

किया जायेगा

जैसे दलदल में तुम किसी को

फंसाते हो वैसे ही चक्रव्यूह में

तुम भी आगे फंसना

किसी समस्या को तत्काल नहीं

सुलझाया

और बस अपना अपना

सोचा

दूसरे को दरकिनार कर

उसे पूरी तरह भुलाया

तो देखना

तुम बच नहीं पाओगे

उसी समस्या से एक दिन

खुद भी जुझोगे और

उससे बाहर कभी निकल नहीं

पाओगे

समस्या इसकी हो या

उसकी

सम्भव हो तो उसे फौरन

हल करें

एक बेहतर व्यक्ति, समाज और समय का निर्माण

करने के लिए।

मीनल

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