दुविधाओं का पहाड़

दुविधाओं का पहाड़

न आसमान में
न जमीन पे
मेरे ख्वाब लटके
अधर में
कभी सूखे पेड़ के
तने पे
कभी अंधे कुएं के
गले में
खूंखार हो गये हैं
आजकल जज्बात मेरे
एकाएक अचानक ही
मन में दुविधाओं का
पहाड़ है
दबे पांव आते हैं
अहसास बिल्ली से
शिकार ढूंढती हैं
भूखी आंखें
लेकिन कहीं किसी कोने में
अपने हाथों मन खुद ही शिकार
है
वो अपनी व्यथा खुद भी नहीं सुनता है
बस भटक रहा है
बन बन
जंगल जंगल
रास्तों पर चलता नहीं
यूं तो यह जंगल उसे
खुद से बाहर निकालने का
रास्ता दिखाने को
तैय्यार है।

मीनल

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