प्रेम गीत

प्रेम गीत

प्रेम गीत
एक नायिका अपने प्रेमी को जब नही मना पाती है तो एक गीत के माध्यम से अपनी बात कुछ इस तरह कहती कहती है इस गीत में नायिका अपने प्रेमी से अपने प्रेम का इजहार करती है:

मैं बहती नदिया सी, तू ठहरा सागर सा
इस प्रेम कहानी का अब पूर्ण किनारा हो।।

गर बन जाये तू चाँद मेरा तो…
हो जाऊं मैं तेरी किरणों स उजियारा
मैं बन जाऊं फूल तेरा खुशबू जो तुम्हारी हो
मेरे दिल के सूने जीवन पे हक सिर्फ तुम्हारा हो
मैं बहती नदिया सी, तू ठहरा सागर सा
इस प्रेम कहानी का, अब पूर्ण किनारा हो।।

मैं पूरब तो तू पश्चिम नहीं दोनों का मेल मिलाप
मैं चाहूँ तेरी राधा बनना जो बन जाये तू मेरा श्याम
बिन तेरे जीना मुश्किल मरना है अब आसान
हो जाऊँ मैं प्रीत तुम्हारी, ये हक जो तुम्हारा हो
मैं बहती नदिया सी, तू ठहरा सागर सा
इस प्रेम कहानी का, अब पूर्ण किनारा हो।।

हैं दोनों के कर्म अलग, मंजिल भी नहीं आसान
जो दिखता नामुंकिन नहीं जिसका कोई संज्ञान
धरा से लेकर गूँजेगी अम्बर तक पहचान
हो सके है सब मुम्किन जो संग तुम्हारा हो
मैं बहती नदिया सी, तू ठहरा सागर सा
इस प्रेम कहानी का अब  पूर्ण किनारा हो।।

मेरे सूखे उपवन में, प्रेम के फूल खिलाने को
आ जाओ जीवन में तुम, बनके जीवनधारा
प्रीत के बाहों में मुझे, खुद में समाहित कर लो
मैं न रहूँ अब मैं, तुम न रहो अब तुम
मिलकर मैं और तुम  हो जायें हम
हरपल एक दूजे का सम्पूर्ण सहारा हो
मैं बहती नदिया सी, तू ठहरा सागर सा
इस प्रेम कहानी का, अब पूर्ण किनारा हो।।

वक़्त तो साथी है, इससे गिला क्या करना
दे खुशियाँ या दे गम हँसके सहना है हरदम
बढ़ जाये कोई बात, हो जाए दोनों में तकरार
मैं तुम्हें मना लूँगी कभी तुम मुझे मना लेना
दो पल की रुसवाई में कभी हार जीत मत करना
मैं हूँ प्रेम की नैया, बन करके खेवइया
करो मेरे जीवन का पार किनारा
मैं बहती नदिया सी, तू ठहरा सागर सा
इस प्रेम कहानी का अब  पूर्ण किनारा हो।।

सुबोध

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