रब से मांगी एक दुआ

रब से मांगी एक दुआ

बरसों बाद
खोली घर की खिड़की
देखी सुबह की धूप मैंने
अपने ही खोल में बंद थी
अपनी ही हदों में कैद
अपनी ही तय सीमायें थी
अपनी ही दिशायें
अपने ही ओर छोर
अपनी ही निशा और भोर
बस रब से मांगी थी
एक दुआ मैंने
जीवन में सब कुछ कुछ कम
मिले लेकिन
किसी को कोई घृणा की दृष्टि से न
देखे
न उसका तिरस्कार करे
अच्छा व्यवहार न करे तो
बुरा बर्ताव भी न करे
अमृत का प्याला पीने को
न दे तो
विषपान भी न कराये।

मीनल

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