बचपन की अठखेलियां

बचपन की अठखेलियां
काश जल तरंग सी
उम्र भर
जीवन के आखिरी पड़ाव तक
बजती रहती
यह हो सकता होता तो
कभी न थमती
एक रुके हुए पानी की तरह
सदैव बहती रहती
एक नदिया की धार की
जवानी की तरह
विचारों में कोई टकराव नहीं
मतभेदों की कोई दीवार नहीं
कोई चिन्ता, कोई मलाल नहीं
बस संग संग बहते जाना
संग संग समय बिताना
संग संग खेलना कूदना
हंसना बतियाना
बारिश के पानियों की तरह
झट से बरस जाना
आसमान में कहीं ठहरना
नहीं
किसी से कोई लगाव
नहीं
फिर भी
मिट्टी की सौंधी सौंधी
सुगंध को
अपनी बाहों में भरकर
उसके संग
घुलमिल जाना।

मीनल

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