मैं न सोऊं

सो गई निंदिया
मैं न सोऊं
ख्वाबों में जगती
रात भर
मैं न सोऊं
दिन उगे तो लगे
सांझ ढली कब
रात्रि बेला में
चांद के तन पे
चांदनी खिली कब
कोई मुझे नींद से जगाये तो
लगे ऐसा कि
नींद की झपकी मुझे आई कब
लोरी सुनाये
मां की जो वाणी
कानों में रस घोलती तो
लगता कि
मां अपनी दुनिया से
मेरे सपनों के घर आई
कब
रात की काली स्याही
जो चंपई धूप खिलाती
आसमां की काली परछाई
का पर्दा हटता तो लगता
यह भोर के दर्पण की
सुनहरी किरण
मेरे मन के द्वार आई
कब।

मीनल

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