बोतल में

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बोतल में

बोतल में
पानी भरे
घूम रहा
इंसान
ढूंढता दारु की दुकान
पूछता राहगीर को
सांसे थाम
मुखड़ा घुमाकर
होता पागल !
पैर कमजोर लड़खड़ाते
फूल जाती सांसें
बिगड़ती तबियत
आँखे होती उदास
काश ! मिल जाये
उसकी भी मंजिल
बुझ जाये प्यास
तड़प अनौखी
करती गुहार !

– अशोक बाबू माहौर

 

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