अब धरा श्रृंगार किया है

अब धरा श्रृंगार किया है ॥
ऋतू बसंत जो आयी है ॥
आनंद मगन हुए भौरे है ॥
कलियाँ भी मुस्कायी है ॥

मोर मगन हो नाच रहा है ॥
उपवन की बढ़ गयी शोभा ॥
निखरा यौवन रूपवती का ॥
रसिक का मन भी है लोभा ॥
मस्त मगन हो चली पुरवाई ॥
उत्सव तितली मनायी है ॥

कोयल कू कू कर गीत सुनाती ॥
महक रही मधुमाश में क्यारी ॥
इस मौसम में खूब लगे अनोखी ॥
कली फूल संग गजब हरियाली ॥
दूर देश से उड़ उड़ कर के भँवरे ||
कलियों पर धाक जमायी है ||

शम्भू नाथ कैलाशी

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शम्भनाथ

पिता का नाम स्वर्गीय श्री बाबूलाल गाँव कलापुर रानीगंज कैथौला प्रतापगढ़ उत्तर-प्रदेश जन्म ०७/०८/१९७४ शिक्षा परानास्तक पुस्तकालय विज्ञानं पेसा नौकरी

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