सरस्वती का नाम नंदा क्यों पड़ा ?

बहुत पहले की बात है पृथ्वी पर एक प्रभंजन नाम के महाबली राजा थे। एक दिन वह वन में मृगो का शिकार कर रहे थे। उन्होंने देख एक झाड़ी के पीछे एक हिरणी खड़ी है। प्रभंजन ने उस हिरणी को निशाना बनाया और हिरणी गिर पड़ी। और सामने धनुष वाण लिए राजा से बोली हे पापी मूर्ख तूने यह क्या कर दिया तूने घोर पाप किया है। मै यहाँ सिर नीचे किये हुए खड़ी थी और शांत मन से अपने बच्चो को दूध पिला रही तूने अपना मुझे निशाना बनाया ,, तेरी बुद्धि बड़ी खोटी है। इस लिए तू जा कच्चा मांस खाने वाला पशु बने। तू इस वन का व्याघ बनेगा। मृगी का शाप सुन के राजा के होश उड़ गए। कल्याणी मै नहीं जानता था कि तूने अपने बच्चो को दूध पिला रही है। अनजान में मैंने तुम्हारा वध किया। अतः मुझपर प्रसन्न हो मै ब्याघ्र योनि को त्याग कर पुनः मनुष्य शारीर को कब प्राप्त करूगा। आप ने जो श्राप दिए है उसकी अवधि भी तो बता दीजिय” महराज के सौ साल बाद यहाँ पर नंदा नाम की एक गाय आएगी उसके साथ तुम्हारा वार्तालाप सुन क्र तुम्हारे शाप का अंत होगा। मृगी के कहने के अनुसार राजा प्रभंजन व्याघ्र हो गया उस ब्याघ्र की आकृति बड़ी गंभीर और भयानक थी। वह जीव जंतु मानव पशु सब की मांस खा कर जीवन यापन करने लगा। वह अपनी निंदा करता और कहता अब मै पुनः मनुष्य का शारीर पाऊगा। अब ऐसा पापनहि करूगा जब उसको सौ साल बीत गए तब एक दिन वहा पर गौवों का झुण्ड आया वहा पर हरी भरी घास और जल की सुविधा उपलब्ध थी। उस झुण्ड में वहाँ पर सर्बगुण संपन्न एक गाय थी। जिसका नाम नंदा था। एक दिन वह अपने झुण्ड से बिछुड़ गयी बाघ उसे देखते ही दौड़ा और कहा आ जा आज विधाता ने तुझे मांस नियुक्त किया है बाघ की आवाज सुन गाय अपने बच्चो को याद करने लगी। और रुदन करने लगी उस गाय को रुदन करते देख ब्याघ्र ने बोला ” ओ गाय संसार में सब लोग अपने कर्मो का फल भोगते है तू मेरे समीप अपने आप आयी इस लिय आज तुम्हारी मृत्यु ही नियति है। अच्छा यह तो बता तू रोयी किस लिए। ब्याघ्र का प्रश्न सुन कर नंदा गाय ने कहा ” ब्याघ्र तुम्हे नमस्कार मेरा अपराध क्षमा करे। मै जानती हूँ तुम्हारे पास आये प्राणी की रक्षा असम्भव है। इस लिय मई अपने मै अपेन जीवन के लिय शोक नहीं करती क्यों कि मृत्यु एक दिन अस=अवश्य आएगी किन्तु मृगराज अभी नयी अवश्था में है। मै एक बछड़े को जन्म दिया है। पहली बियान का बच्चा होने के कारण वह हमको प्रिय है। मेरा बच्चा अभी केवल दूध पीता है। इस समय गोष्ठ में बंधा है। और भूख से बिकृत हो कर मेरी राह देख रहा होगा। उसी के लिए मुझे शोक हो रहा है पुत्र मोह से बशीभूत हो रही हूँ और उसे दूध पिलाना चाहती हूँ। आप हमें थोड़ी देर के लिए जाने दीजिये बछड़े को दूध पिलाने के बाद उसका चाटूँगी उसको होतोहित की जानकारी के लिय अपने कुछ उपदेश दूगी फिर मै आप के पास आ जाऊगी। बाघ बोले तुझे अब पुत्र से क्या काम है पहले पहले हमें बच्चा दिया समस्त साथियो से विदा लेते वापस आ जाऊगी मै शपथ खा कर कहती हूँ। बाघ को विशवास हो गया। लेकिन कुछ लोग तुम्हारे से यह कहेगे स्त्री के साथ हास परिहास में विवाह में गौ को संकट में बचाने के लिए जो शपथ ली जाती है। उसकी उपेक्षा पाप नहीं लगता किन्तु तुम उन बातो पर विशवास नहीं करना इसी वार्तालाप से बाघ को मनुष्य शारीर प्राप्त हुआ और मनुष्य शारीर को पापसे मुक्ति और पवित्र करने के लिए सरस्वती को प्रकट होना पड़ा था। सरस्वती का एक नाम नंदा भी है।

शम्भू नाथ कैलाशी

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शम्भनाथ

पिता का नाम स्वर्गीय श्री बाबूलाल गाँव कलापुर रानीगंज कैथौला प्रतापगढ़ उत्तर-प्रदेश जन्म ०७/०८/१९७४ शिक्षा परानास्तक पुस्तकालय विज्ञानं पेसा नौकरी

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