सच्चा प्रायश्चित

सच्चा प्रायश्चित

उस समय मेरी उम्र बारह-तरह वर्ष की रही होगी । मेरे भाई पर पच्चीस रुपये कर्ज़ हो गया था । हम दोनों भाई सोच रहे थे कि उस कर्ज को कैसे चुकाएँ । मेरे भाई के हाथ मैं सोने का ठोस कड़ा था । उसमें से एक टोला सोना कट लेना कोई मुश्किल काम नहीं था । कड़ा कटा कर्ज़ अदा हुआ , पर मेरे लिए यह बात असहनीय हो गई। मैंने निश्चय किया कि आगे से कभी चोरी नहीं करूँगा ।
मुझे लगा कि पिता जी के सामने अपनी गलती को स्वीकार भी कर लेना चाहिए पर उनके सामने मुंह खुल ही नहीं । इस बात का दर तो बिलकुल नहीं था कि पिता जी मेरी पिटाई करेंगे । मुझे याद नहीं पड़ता कि उन्होंने कभी हममें से किसी भाई को पीटा हो पर स्वयं तो दुखी होंगे ही । मैंने सोचा कि उन्हें दुःख तो होगा लेकिन यह जोखिम उठकर भी अपनी गलती को स्वीकार कर लेना ही ठीक रहेगा । उसके बिना भूल का सुधर नहीं होगा ।
आखिरकार मैंने तय किया कि पिता जी को पत्र लिखकर अपना दोष स्वीकार कर लूँ और क्षमा माँग लूँ । मैंने तुरंत पत्र लिखकर अपना सार दोष स्वीकार किया और इस गलती की क्षमा माँगी ।मैंने पत्र में उनसे विनती की कि वे स्वयं को दुःख में न डालें । साथ ही, भविष्य में एस अपराध नहीं करने की मैंने प्रतिज्ञा की ।
मैंने कापते हुए हाथों से पत्र पिता जी के हाथ में थम दिया और उनके तख़्त के सामने बैठ गया । उन दिनों पिता जी बीमार थे, इस कारण बिस्तर पर ही पड़े रहते थे । चारपाई के बदले लकड़ी का तख़्त काम में लाते थे ।
पिता जी उठ बैठे । उन्होंने पत्र पढ़ा । आँखों से मोती की बुँदे टपकी । इससे पत्र भीग गया । उन्होंने क्षण भर के लिए आँखे मूंदी, पत्र फाड़ दल और फिर से लेट गए ।
मैँ भी रोया । मैँ पिता जी का दुःख समझ गया था । अगर चित्रकार होता तो वह चित्र आज वैसे का वैसे खींच देता । आज भी वह दृश्य मेरी आँखों के सामने स्पष्ट है । मोती की बूंदों के उस प्रेम – बाण ने मुझे बेध दल लेकिन उनसे मैँ शुदध बना । मेरे लिए यह अहिंसा का जीता-जागता पाठ था ।

इस प्रकार की शांत क्षमा पिता जी के स्वभाव के लिए बिलकुल उलट थी । मैंने सोचा था कि वे क्रोध करेंगे, कड़वी बातें कहेंगे, शायद अपना सर पीट लेंगे । पर, उन्होंने इतनी शांति धारण कर ली । मेरे विचार से इसका कारण यह था कि मैंने अपनी गलती स्वीकार कर ली थी । जो मनुष्य अपनी मर्ज़ी से और बिना किसी कपट के अपनी गलती स्वीकार कर लेता हैं और फिर कभी वैसी गलती नहीं करने की प्रतिज्ञा करता है, वह सबसे सच्चा प्रायश्चित करता है ।
मैँ जानता हूँ कि अपनी गलती मानने से पिता जी मेरे बारे मैँ निश्चिन्त हो गए और मेरे प्रति उनका स्नेह और भी बढ़ गया ।

– महात्मा गांधी

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