समय का पंछी

समय कैसे पंख लगाकर
उड़ रहा
भवसागर को पार करता
थकहार कर
बैठ जाता
पल तो पल
एक चट्टान पे या
समुंदर की लहरों पे तैरती
एक नाव के मचान पे
इस समय के पंछी का
घर कहां है
आकाश में
धरती के जहां में या
पानी पी बहते
नाव के मकान में
शायद कहीं नहीं
पल दो पल का
डेरा है
यह जीवन रैन बसेरा है
उड़ते रहना
थोड़ा बहुत विचरना विचारना
फिर कहीं थकहार कर
बैठ जाना
सुस्ता लेना
कोई एक दिशा पकड़कर
उस तरफ ही उड़ते जाना ही
इसकी नियति
इसकी हकीकत
इसका मन मे पलता भ्रम
या जीवन
यह तो वो ही जाने
उससे बेहतर भला उसे
कौन जानेगा।

मीनल

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