कंगना बाजे घडी घडी

जब से उससे आँख लड़ी ||
कंगना बाजे घडी घडी।।
मै आहे भरती पड़ी पड़ी।।

उसकी सुरती आँख में नाचे।।
मन के साज हमारे बाजे ||
मै उसे निहारू खड़ी खड़ी ||
आहे भरती पड़ी पड़ी।।

उसकी बतिया हंसी बिखेरे।।
मन के तार हमारे छेड़े।।
भरी जवानी छलक पड़ी।।
उससे मेरी आँख लड़ी ||
आहे भरती पड़ी पड़ी।।

शर्म हया सब भूल गयी हूँ।।
उसकी बाहों में झूल गयी हूँ।।।
उसका ही अब ध्यान धरी ।।
आहे भरती पड़ी पड़ी।।

सारा सिंगार करके आयी ||
महगा महगा सेंट लगाई।।
होठो से हंसिया झड पड़ी।।
आहे भरती पड़ी पड़ी।।

चढ़ी जवानी झोका मारे।।
सावन बरसे हमें उस्कारे।।
मै बारिस में भीग पड़ी।।
आहे भरती पड़ी पड़ी।।

शम्भू नाथ कैलाशी

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शम्भनाथ

पिता का नाम स्वर्गीय श्री बाबूलाल गाँव कलापुर रानीगंज कैथौला प्रतापगढ़ उत्तर-प्रदेश जन्म ०७/०८/१९७४ शिक्षा परानास्तक पुस्तकालय विज्ञानं पेसा नौकरी

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