एक पॉइंट पे खड़ी मैं

एक पॉइंट पे खड़ी
मैं सड़क के एक मोड़ तक
निगाह दौड़ा पा रही हूं
उस मोड़ से उस सड़क के
मुड़ते ही
आगे के दृश्य देख पाने में
असमर्थ हूं
कभी बीच में पहाड़ियां आ रही हैं तो
कभी वो रास्ता खत्म होता प्रतीत हो
रहा है
आगे समुन्दर का पानी दिख रहा है
फिर आकाश और
उसपे मंडराते कुछ बादलों के
टुकड़े
जो सड़क दृष्टांत है उसपर भी
विघटन, दुर्घटनायें और
रुकावटें बीच बीच में
पैदा हो रही हैं
फिर सब थम जाता है
सामान्य होने लगता है
फिर असामान्य
फिर सामान्य
यह सब भी कुछ कुछ ऐसे हो रहा है
जैसे सड़क पे चलती कोई गाड़ी
या कार अपनी गति बदलने
के लिए अपना पहिया
बार बार घुमाती हो
पहिया रुक जाये तो
गति भी रुक जायेगी
सब कुछ पीछे छोड़कर
कभी अच्छी तो कभी बुरी
यादों के पुलिंदे भुलाकर ही
जीवन के रास्ते पार
किये जा सकते हैं
उन पर आगे बढ़ा जा सकता है
नहीं तो बस नहीं
बीते हुए पलों को हृदय से
लगाये रखेंगे
तो कदापि नहीं।

मीनल

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