समुन्दर के मंजीरे

पहाड़ियों की ओट से
झांको तो बस
दूर तक समुन्दर के मंजीरे
दिखाई पड़ते हैं
रोमांचक भी है और
भय उत्पन्न करता एक
अहसास भी
आसमान के नीचे
रेत के ऊपर खड़े होकर
महसूस हो रहा है जैसे
मेरा बदन मुझे छोड़कर
कहीं अंदर धंस रहा हो
खींचकर पांव बाहर निकालने का
प्रयास करना पड़ रहा है
कोई छाप नहीं छोड़नी मुझे
कोई पहचान नहीं छोड़नी
अपना जीवन त्यागने के
बाद
जीवन चल रहा है
मौत की कल्पना
उड़कर आती है और
छू लेती है मुझे
पल दो पल
फिर गुम जाती है
यह खुली आंखों से देखे
बुरे सपने का
जीता जागता अहसास सी है
समुन्दर के किनारे से
टकराती लहरों
मेरे रेत पे बने पदचिन्हों को
धोकर
वापिस पीछे मुड़कर
जहां से आई थी
वहीं अपने रास्ते लौट जाओ
मुझे मेरे हाल पे छोड़ो
कोई मुझ पर रहम न खाओ
अपने कर्म करते चलो
और दूर कहीं
मुझसे जुदा होकर
तन्हा छोड़कर
कहीं खो जाओ।

मीनल

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