गांव के तीन चेहरे

गांव में भीड़ थी। गांव में सन्नाटा पसरा था। गांव में मैं अकेला था। भीड़ का हिस्सा भी नहीं था। मौसम खराब था। मूसलाधार बारिश थी। अपने घर से सुबह निकला था और शाम को एक नदी की पुलिया से होता हुआ अपने घर की तरफ वापिस लौट रहा था। मेरे पीछे पीछे गांव का एक आवारा कुत्ता पालतू सा बनकर चलता मेरे छाते के नीचे शायद घुसकर बारिश से बचने के लिए प्रयासरत दिख रहा था।
यह गांव के तीन चेहरे थे। भीड़, सन्नाटा और अकेलापन। संवेदनशीलता तो जैसे इस दुनिया से खत्म होने की कगार पर है।
सुबह सड़क पर एक भयंकर हादसा। कार एक्सीडेंट। किसी युवा की शहर की ओर जाती कार गांव की बकरी से टकरा गई। बकरी मर गई। गांव वालों का गुस्सा किसी बरसों से दबे ज्वालामुखी के लावे की तरह फूट पड़ा। बकरी की मौत से बौखलाये गांव वासी उस युवा पर टूट पड़े। यह हमला जानलेवा साबित हुआ। गांव वालों के हाथों उस युवा को बिना किसी बड़े कारण के अपनी जान गंवानी पड़ी। दिनभर गांव में कोहराम मचा रहा। मौत की खबर उस सम्पन्न परिवार के युवा के घर तक पहुंची तो उसकी बीवी बेवा तो बच्चे अनाथ हो गये। उनके दिलों में हमेशा के लिए सूनापन घर कर गया।
यह सब एक बुरे सपने जैसा था। कहां से कैसे सब शुरू होता है। आसमान में काले बादलों का उमड़ना, बिजली का गिरना, सब कुछ पलक झपकते उजड़ जाना, तहस नहस हो जाना। किसी का कुछ नहीं बिगड़ता बस जीवन उजड़ जाता है उस परिवार का जो उस मृतक से जुड़े होते हैं। मैं कुछ सोचता, मन मन में बुदबुदाता, गश खाया सा बेबस चला जा रहा था बारिश से गीली सड़क पर अपने गंतव्य स्थान की ओर यह सोचता कि काश मैं समय रहते कुछ कर पाता। इस समाज को कुछ मार्गदर्शन दे पाता। न जाने कितने युगों से इस समाज के लोगों को कोई न कोई महापुरुष या हम जैसे सामान्य पुरुष समझा ही रहे हैं पर आज तक कोई समझा क्या।

मीनल

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