पत्थर के एक टुकड़े सा

नदी का जल बह रहा है
लेकिन मैं पत्थर के एक
टुकड़े सा
यहीं कहीं सिर से पांव तक
फंसा पड़ा हूं
जल से बाहर सिर निकालकर
देख लेता हूं
आसपास की हरियाली को
पानी की कलकल करती
किलकारी को
आसमान को सिर उठाकर
देखने का साहस
मुझमें नहीं
ऐसा करने का दुस्साहस किया
तो बह जाऊंगा
बहता ही चला जाऊंगा
छोड़कर अपने दिलकश नजारों
को
मुझे हरदम अंग लगाते
किनारों को।

मीनल

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