सीप में मोती

सीप में मोती

सीप में मोती
आसमान में चांद
कितना अपना
कितने करीब
फिर भी हो जाता
वक्त के प्रवाह में
खुद से दूर
आंखों से ओझल
छीन लेती दुनिया
हो जाता पराया
कभी एक झलक भी न दिखती
कभी यादों की परछाइयां
घटती बढ़ती दिखती
कभी हाथ ही न आता
कभी यादों के धरातल से भी
फिसल जाता
कभी दिल की गहराइयों से
एक आवाज लगाता
ढूंढने पर भी न मिलता
बिछड़ा बिछड़ा जो बिछड़ा
इस जीवन में एक बार
फिर दोबारा
लाख जतन करने पर भी
मिल नहीं पाता।

मीनल

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