बाजार में बैठी मैं

बाजार में बैठी मैं

बेचने को लेकर
बाजार में बैठी मैं
तरह तरह का सामान
बाट जोह रही
खरीदार की
राह भरी लोगों से, नहीं है खाली
पर किस्मत की मार
पैसों से भरी जेबें सबकी पर
नीयत खाली
दिनभर में
मुट्ठी भर ग्राहक भी आ जायें
तो रात का भोजन कर
पेट भर जाये मेरा
यही मिले
और यही सिलसिले चले तो
भगवान ही जाने
कब तक चलेगा जीवन मेरा
भूख की मार
पैसों की मार
लोगों का बेरुखी भरा
रवैय्या
यही बातें तोड़ देती हैं
दिल किसी का
टूटा दिल लिये ही
रुखसत होता है
हर कोई इस दुनिया से
खासतौर से तब और
जब हो वो गरीब,
बेसहारा और अकेला।

मीनल

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