पागल

पंजाब से बुआ जी का वीडियो कॉल था। हम मां बेटी के देश भर में चल रहे लॉक डाउन के चलते खोज खबर लेने को व्याकुल थी।
“और, बड़ी कविताएं लिखी जा रही हैं आजकल”, बुआ जी के मुह से यह सुनकर मैंने फौरन पूछा, “अच्छी लगी”, कोई उत्तर न मिलने पर मैंने ही बात को आगे बढ़ाया और बोली, “मैं तो कविताएं बचपन से लिख रही हूं। यह कोई नई बात थोड़े ही न है मेरे लिए। हां, सोशल मीडिया के कारण लोगों तक इसकी पहुंच बढ़ गई है। बड़ी तादाद में अब प्रकाशित भी हो पाती हैं।”
बातों ने मौन सा धारण कर लिया था। उधर से आवाज आई, “भाभी कभी कभार फोन कर लिया करो।” यह कहकर कॉल उनकी तरफ से काट दी गई लेकिन फोन लाइन अभी भी चल रही थी।
वहां से आवाज आई कि रात के बारह बजकर नौ मिनट पर कविता लिखी है। है पागल।
मुझे देर से सही पर मेरी कविता की तारीफ सुनने को मिल गई थी। मुझे आगे और अनुचित और भद्दी टिप्पणियां सुनने को मिलती, उससे पहले मैंने फोन लाइन को काटने में ही अपनी भलाई समझी।

मीनल

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