ग़ज़ल

वक़्त का मारा हुआ इंसान
पंछियों की तरह फड़फता रहा

वक़्त का तकाज़ा है जनाब
प्रकृति ने तोड़ दिया इंसानों को!

समय के साथ कुदरत का कहर
सबने आ गया होश जनाब………..

बेसब्र से बेताबी तक हो गए हताशे
संसार ने अब जाना कुदरत का असर!
प्रेम प्रकाश
12/04/2020

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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