कविता

पोस्ट ००१…
नफ़रत कभी कभी
दिल में उभर आती है
ख़ुद से भी ख़ुद से हो जाती है
दिमाग में सौ उलझने हो जाती है

मन के अंतद्वंद्व में
प्रतीत होता है
सबकुछ जानते हुए भी
आत्मा इतना शांत है!

संसार की सभी
वस्तुओं से दूर
एकाग्रता पाएं कैसे
जहां शांति की प्राप्ति हों

मैं शांति से दो पल जी सकूं
जहां न कोई सवाल हों
जहां न कोई जबाब हों
और मेरी परछाई हों!
प्रेम प्रकाश
१७.०४.२०२०

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Voting is currently disabled, data maintenance in progress.

प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

Leave a Reply