तन्हाई में तू और मैं

…ग़ज़ल….

तारों के निकट बैठा तो
खुद को अंधेरे में पाया

उजालों से डर लगने लगा
भक्त बन बैठा हूँ इश्क़ का

किताब जैसा ग्रंथ बन गया
गमों का हिसाब कितना रखूं

सिसकियों से आंसू सुख गए
लाली अब अक्सर आँखें लगती

बेहिसाब इश्क़ में, मैं तन्हा हो गया
है प्रेम से इकरारनामा इस सफ़र तो!
प्रेम प्रकाश, २४.०४.२०२०

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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