रेत का घरौंधा बनाया

ग़ज़ल
घरौंदा बहुत बनाया रेत पे।
नदी के लहरों ने बिखरा दिया।।

हमको याद है बचपन की दास्तां।
जवानी में बिखर गया सारे सपने।।

क्या बताएं बालपन की कहानी।
छुप-छुपाई खेलना सारे याद है।।

धिरे – धीरे खोखले अरमान होते गए।
चुपके से मिक्चर खाना याद है मुझे।।

घर में अक्सर शरारत करना याद है।
कोठी के पीछे छिपना याद है मुझे।।
प्रेम प्रकाश, २७.०४.२०२०

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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