ख्वाब का मोहब्बत

ग़ज़ल
ख्वाबों के अंगड़ाई का हाल न पूछो
दिनों में मिलने की बेबसी न पूछो

हमरा हाल ए इश्क़ न हमसे पूछो
मुस्कुरा के गुजारता हूँ हर एक क्षण

तन्हाई में शामें, आहें भरती मेरी बाहें
दूर कैसे रहता हूँ दिले ए महबूब जाने

आसला हो तो चला दें मेरे दिल पे कोई
इश्क़ के बिना प्रेम भंवर में डूबते देखा!
प्रेम प्रकाश ०४.०५.२०२०

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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