मधुर स्मृति

मधुर स्मृति

आज मैं तुम्हें न पा सका,
इसलिए न गीत गा सका।
बहार फूल तो खिले मगर,
मिले उसे भ्रमर न हो‌ अगर,
तो आश क्या कि फूल की उमर,
हंसे नियति हिलोर में लहर।

जोहता रहा तुम्हे सदा,
उठी कसक न मैं भगा सका।

लगी आज टकटकी उधर,
चली गई थी रूठकर जिधर
हुआ हताश आज मैं मगर,
रहे न याद प्यार के प्रहर,

‌ रही सदा सुदूर प्राण, तुम
इसीलिए तुम्हें न पा सका।

पी रही हैं जिन्दगी जहर,
घिर रही है वेदना घहर,
कट रही है व्यर्थ ही उमर,
निराश दीप जल रहा लहर,

कुविघ्न पर कुविघ्न झेलता,
पुकारता तुम्हें न पा सका ।।

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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