मानवता

मानवता

किसी गाँव में एक दार्शनिक रहता था। वह मानवता पर एक ग्रंथ लिख रहा था। वह रोज़ सुबह उठकर जल्दी तैयार होकर अपने घर से कुछ दूर एक झोंपड़ी में एकाग्रता से ग्रंथ लिखता था। लिखने में वह इतना मग्न रहता था कि घर पर खाना खाने आना भी भूल जाता था। इसलिए उसने अपनी झोंपड़ी में एक अलार्म घड़ी रखी हुई थी। जब वह घर आता तो उसकी पत्नी उसे जल्दी से गर्म खाना परोस देती थी। उसकी पत्नी एक धार्मिक औरत थी। पर उन दोनों के जीवन में एक कमी थी। उन दोनों की कोई संतान नहीं थी।

वह सर्दियों के मौसम का एक ठंडा दिन था और उस दिन सर्दी बहुत ज्यादा थी। पर वह दिन उस दार्शनिक के लिए बहुत खास था। आज उसका ग्रंथ पूरा होने वाला था। उसकी पत्नी ने उससे कहा “आज बाहर बहुत सर्दी हे, आज मत जाओ। बारिश भी बहुत तेज है”। उसने अपनी पत्नी से कहा ” आज मुझे मत रोको आज मेरे पुरे जीवन के परिश्रम का फल मिलने वाला है”। ऐसा कहकर वह अपना छाता और कंबल लेकर लेकर झोंपड़ी की ओर चल दिया। वह अपनी झोंपड़ी में पहुँचा और वहाँ वह ग्रंथ पूरा करने जुट गया। ग्रंथ पूरा होने के बाद जब वह घर जाने के लिए निकला तो उसकी झोपड़े के बाहर उसे किसी चीज से ठोकर लगी। उसने देखा कि उसे ठोकर एक छोटे बच्चे से लगी है। वह समझ गया कि उस बच्चे को कोई उसकी झोंपड़ी के बाहर छोड़ गया था। वह बच्चा काफी देर से बाहर ठंड में बारिश में बड़ी देर से था। जिससे वह एक दम नीला पड़ा था पर उसकी बहुत हल्की – हल्की साँसे चल रही थी। वह उस बच्चे को लेकर वापस अपनी झोंपड़ी की ओर चला गया। उसकी झोंपड़ी में एक टीन का डिब्बा जिसमे कुछ कागज थे। उसने उस डिब्बे में कागज जला कर उस बच्चे को गर्मी दी। पर वह ज्यादा देर नहीं चले। उसके झोपड़े में छ: मोटे – मोटे ग्रँथ फाड़ कर जला दिए। उनसे गर्मी पाकर बच्चे की साँसे चलने लगी और वह रोने लगा। वह दार्शनिक उस बच्चे को एक कंबल में बाँधकर घर ले गया। जब वह घर पहुँचा तो उसकी पत्नी ने उससे पूछा कि कंबल में क्या है। उसने कहा ” मेरे पुरे जीवन के परिश्रम का फल”। जब उसकी पत्नी ने देखा कि कंबल में एक बच्चा है तो वह बहुत खुश हुई।

-अतुल

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