मानव और प्रकृति

मानव और प्रकृति

मानव था तो समझ नही पाया।
जब जानवर बना तो समझा।।

प्रकृति नें ऐसा थपेड़े दें मारा।
खुद जान हलक पे आ गया।।

बेजुबाँ को बहुत क़ैद किया था!
अब बेजुबाँ आज़ाद हम क़ैद!!

लाचारीयों के अलावा कुछ न बचा
ये प्रेम का नही प्रकृति का प्रकोप हैं!!

प्रेम प्रकाश
15.05.2020

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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