एक चोरी की कविता

एक चोरी की कविता

सुनो दोस्तों…!
मैंने एक कविता लिखी है,
पर सच बताऊँ…!!
लिखी नहीं, चुराई है…॥

भटकते विचारों से…
किताबों से, अख़बारों से…
रोज़ समाचारों से…
थोड़ी-थोड़ी चुराई है…।
दोस्तों लिखी नहीं……॥

कुछ यहाँ से, कुछ वहाँ से…
ना जाने कहाँ-कहाँ से,
लगता है सारे जहाँ से…
सबकी गुनगुनाहट चुराई है…।
दोस्तों लिखी नहीं……॥

सुबह की झोली से खिल-खिलाहट…
शाम की डोली से सरसराहट,
रात की गहराई से दबी दबी आहट…
चुराते हुए आँख भी भर आई है…।
दोस्तों लिखी नहीं……॥

बचपन की हँसी…
तरुणाई की चपलता,
यौवन की अंगड़ाई भी…
चुपके से चुराई है…।
दोस्तों लिखी नहीं……॥

प्रकृति में क़हर है…
समाज में ज़हर है,
समझ नहीं पाता हूँ…
चुरा नहीं पाता हूँ,
भूख मिटाने भर को…
रोटी ही चुराई है…।
दोस्तों लिखी नहीं……॥

उकेरता हूँ पन्नों पर…
लिख भी नहीं पाता हूँ,
इस उधेड़-बुन में मैंने…
क़लम भी चुराई है…।
दोस्तों लिखी नहीं……॥

कुछ को ये मौलिक सी लगे…
कुछ को लगे गागर सी,
कुछ को भौगोलिक सी लगे..
कुछ को महासागर सी,
शरमाती इठलाती…
अभी बाहर आई है…।
दोस्तों लिखी नहीं……॥

चोरी की कविता है..
कितने दिन टिकेगी ये,
महीने भर के बाद फिर..
रद्दी में बिकेगी ये…
थोड़ी और ‘जी’ जाए,
यही सोच कर मैंने..
आपको सुनाई है…।
दोस्तों लिखी नहीं……॥

सुनो दोस्तों मैंने कविता यही चुराई है
बस, कविता यही चुराई है…।
लिखी-विखी कुछ भी नहीं,
बस, कविता ही चुराई है… कविता ही….॥

(रमेश चन्द्र)

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