भूख की जंग

भूख की जंग

कोरोना का कहर हम सह भी लें।
भूख के जलाल को कैसे सहें।।

निकल पड़ें हैं सुनसान राहों पर।
खाने की सुध न रहने का ठिकाना।।

बीवी बच्चों के साथ निकल पड़ा हूं।
ज़िंदगी की खोज में जहां भोजन हों।।

दुखों का पहाड़ ऊपर से गठरियों का।
नाजुक हाल है शरीर का बोझ सहना।।

कई दिनों से भूखें, मेरे आंखों के तारें।
बेवस हूं लाचार हूं “प्रेम”अपने हालात से।।
प्रेम प्रकाश १७.०५.२०२०

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Voting is currently disabled, data maintenance in progress.

प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

Leave a Reply