साहित्य समाज का दर्पण

साहित्य समाज का दर्पण

किसी भी लिखित अभिव्यक्त का नाम साहित्य है। मनुष्य और समाज तथा उसकी मान्यतायें परिवर्तन होती रही है। और इसी के अनुसार साहित्य का स्वरूप भी बदलता रहा है, न तो मनुष्य न ही समाज और नही साहित्य कभी गिरता या उठता है, वह बस बदल जाता है और इसी निश्चित परिवर्तन को हम अपनी मान्यताओं और समय के अनुरूप गिरते हुये या उठते हुये क्रम में मान सकते है किन्तु यह केवल एक हमारी मान्यता है इसका कोई सर्व भौमिक महत्व नहीं है।

समाज और साहित्य में शालीनता और अश्लीलता की मान्यताऐं भी समय-समय पर बदलती रही है, कालीदास द्वारा लिखित नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम की नायिका मंच पर अपनी सखी से चोली के बन्धनों को ढीला करने की बात कहती है, इसी दृश्य को हम कुछ वर्ष पूर्व तक अश्लील मान सकते थे, किन्तु उस समय के समाज और मेरे विचार से आज के समाज द्वारा भी इस दृश्य को अश्लील नही माना जा सकता है, यह नायिका की एक सामान्य और आवश्यक प्रतिकृया भी हो सकती है। श्री कृष्ण की रास लीला को जिस समाज ने मान्यता दी वह कितना विकसित और उच्च शिक्षित तथा पुरूष और स्त्री के बीच स्वीकार्य सम्बन्धांे

उनकी निकटता को मान्यता देने वाला समाज रहा होगा, आज हम इसकी केवल कल्पना ही कर सकते है। इस रास लीला को हम केवल अध्यात्मिक कह कर इसकी उपयोगिता और महत्व को कम नही कर सकते, यह रास एक उच्च शिक्षित तथा पुरूष और स्त्री की गहरी निजता को सहज और सरल रूप से स्वीकार करने वाला समाज रहा होगा, हम अभी भावनात्मक रूप से वहां तक नहीं पहुच सके है।

धर्म, हिंसा, अहिंसा, मानवीय सम्बन्धों उनके मूल्यों के सम्बन्ध में भी क्रमशः होने वाले इन परिर्वतनों को साहित्य ने समय-समय पर अपने शब्द से और भी उचित अभिव्यक्त दी है। भारत में उन्नीस सौ सत्तर के दशक में श्री जय प्रकाश नरायन जी के अन्दोलन में श्री दुष्यतं कुमार जी की कविताओं ने एक नयी चेतना भर दी थी, जिसने उस समय की सत्ता को हिलाकर रख दिया था, केवल साहित्य में ही वह शक्ति है जो जन मानस को दिशा दिखा सकता है, या अन्धकार में भी डुबो सकता है,

यह निर्भर करता है साहित्यकारों की निष्ठा पर, किन्तु इतिहास इस बात का प्रमाणिक साक्षी रहा है कि हमारे समाज के साहित्यकारों ने प्रत्येक समय या काल खण्ड में समाज में नयी ऊर्जा शाक्ति और चेतना का ही संचार किया है, एक-दो अपवादों को यदि छोड़ दे तो, साहित्य ने समाज को एक जुट रखने और उसे एक सूत्र में सफलता पूर्वक बांधे रखने का भी कार्य किया है वह भी हमेशा से और मुझे विश्वास है ऐसा आगे भी होता रहेगा। मनुष्य और समाज की चेतना में स्वाभाविक रंग भरने का कार्य साहित्य ही करता आ रहा है। और आगे भी करता रहेगा, यह अनवरत क्रम है, आज का समाज यदि कल के साहित्य का नियमक है तो कल का साहित्य आज के समाज के रूप का।

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