फेरीवाली

मेरे नीचे वाली सीट पर बैठे महाशय को फेरीवाली से ठन गयी। जिस स्वेटर का मूल्य शुरू में छह सौ रूपया बतायी थी‚ उसे वह दो सौ पर देने को तैयार थी, पर महाशय डेढ़ सौ से एक पैसा आगे बढ़ने को तैयार न थे। उसने स्वेटर की ख़ूबियाँ गिनायी, उसे बनाने में लगे ख़र्चे गिनाई, बेचने के क्रम में किन-किन महाशयों का जेब गरम करना पड़ता है, ये भी बतायी, अपनी परेशानियाँ और तकलीफ़ें गिनायी; किन्तु महाशय टस से मस न हुये। जब किसी अस्त्र-शस्त्र से काम न चला तो, उसने अपना ब्रह्मास्त्र निकाली—“देखों बाबूजी‚ दो सौ रूपया मेरी लागत है। सुबह का समय है, सोचती हूँ आपके हाथों से बोहनी हो जाए, वरन् यही स्वेटर बाहर आपको छह सौ से कम में न मिलेगा। मैंने भी हजारों स्वेटर इसी दाम पर बेची है। पहले ग्राहक से बोहनी शुभ होता है। बाबूजी‚ अपने बच्चे की क़सम खा रही हूँ, दो सौ से कम में परता न पड़ेगा।”
कुछ समय के लिए मैं शून्य हो गया। मेरे जैसे लोगों के लिए क़सम खाना असाधारण बात है, उसमें भी बच्चे की। लेना हो ले, न लेना हो न ले, इसमें क़सम खाने की क्या ज़रूरत है ! क्या यह विवशता है या महज़ व्यापार ? मैंने देखा मियाँ जी के साथ की स्त्रियाँ विचलित हो गयी थीं। उनसे दो सौ में स्वेटर लेने का इशारा कर रही थीं। मियाँ महाशय निःसंकोच बोले—“तुमलोग चुप रहो जी, पैसे मेरे हैं। इसे कितनी मेहनत से कमाया है, मैं ही जानता हूँ। आपलोग घर में बैठी रहती हो, क्या जानो बाहर आदमी कितनी मुश्किलों और मुसीबतों से एक—एक पैसा इक्ट्ठा करता है। मैं इसे मुफ़्त में नहीं उड़ा सकता।”
उसी समय हाथों के बल सरकता हुआ, भजन गाता‚ दोनों पैर विहिन‚ एक भिखारी कटोरा फैलाये माँगता हुआ आया। मियाँ की दूसरी बेगम ने बच्चों के हाथों एक सिक्का भिखारी के कटोरे में डलवा दिया। वह आशीष देते हुए भजन गाता सरकता हुआ आगे चला गया। उसके चले जाने पर मियाँ बोले—“इन भिखारियों को तुम दीन—दुःखी और बेसहारा न समझो। माँगों तो एक रूपया के लिए दो हजार का छुट्टा कर देंगे। किसान बेचारा हजारों लगाकर, सारा दिन कड़ी मेहनत करता है‚ तब किसी तरह दो जून की छूछे रोटी नसीब होती है। उसपर भी कभी सुखा, कभी बाढ़, कभी रोग‚ एक न एक व्याधियाँ आयी ही रहती हैं। कभी जब सब अच्छा होता है तो दाम नहीं मिलता। ये लोग दिन भर माँगते हैं और शाम को चिकन—दारू, कबाब, मिठाइयाँ उड़ाते हैं । ये जो खाते हैं‚ हम आप क्या खायेंगे ! इनका धंधा बिना लागत का है। मैं इनकी असलियत जानता हूँ; इसलिए इन्हें नहीं देता। हाँ, जो सचमुच बेसहारा और लाचार है‚ उन्हें ज़रूर दो, सरीयत भी इसकी इज़ाज़त देता है। मैं ख़ैरात का विरोधी नहीं हूँ, इससे ख़ुदा का रहमत बरसता है, बरकत होता है। मगर आदमी इस योग्य होना चाहिए। अभी जो भिखारी गया‚ उससे बहस करके देखो दम ही दम में पचासों आदमी इक्ट्ठा कर लेगा।”
इन बातों से उबकर फेरीवाली बोली—“बाबूजी‚ आप साफ—साफ बताओं‚ कितना देना चाहते है ?”
मियाँ दृढ़ता से—“ डेढ़ सौ से अधिक न दे सकूँगा।”
“आप एकदम क़सम ही खा लिये हो।” स्वेटर अपने झोले में रखती हुई—“आपको लेना नहीं है।”
“लेना क्यों नहीं है ! नहीं लेना होता तो पूछता ही क्यों ?”
“चीज़ यदि पसन्द आ जाये तो आदमी दस, बीस, पचास नहीं देखता,उसे ले लेता है।”
एक अच्छा—ख़ासा जमावड़ा लग गया था और भी कई स्त्री—पुरूष खासकर नवयुवक आकर साल और स्वेटर देखने लगे। वह युवती बैग आगे रखकर मियाँ की सीट पर बैठ गयी। मियाँजी एक तरफ़ हो गये। बेगमपूरा एक्सप्रेस के शयनयान में यात्रियों की खचाखच भीड़ थी। वेटिंगवाले गलियारों और दरवाज़ें के बग़ल में थककर बैठ रहे थें। चारों तरफ़ चहल—पहल, शोर—शराबा था। चाय वाले, नास्ते वाले, चना वाले, गुटखा—सिगरेट वाले, माला—पर्स वाले, कुरकुरे— बिस्कुट और भी कई चीज़ों को बेचने वाले रटी—रटाई शब्दों और कवित्व या शायराना अंदाज़ में अपनी महफ़िल जमाने और आय बढ़ाने की चिंता में लगे थें।
सहसा एक आठ साल का बालक, जिसके मुख उसके कपड़े की ही तरह मलिन था, वो केवल जांधियाँ और बनियान पहने था। जिसमें कई जगह छेद हो गये थें । आकर हाथ फैला दिया और अपने रटे वाक्य दोहराने लगा। एक—दो लोगों ने उसके हाथों में सिक्का रख दिया। अब वह डाढ़ीवाले महाशय की तरफ़ हाथ किया। मियाँ झट से बोले—“चल मेरे यहाँ काम करना, भरपेट भोजन और कपड़ा दूँगा। स्कूल भी भेजूँगा। चलेगा ?”
बच्चा—“मेरा एक छोटा भाई और माँ भी है।”
उनमें से एक महाशय बोले—“तुम्हारे पिताजी क्या करते है ?”
“माँ कहती है, ट्रेन से कट के मर गये, तब हम छोटे थे। बाबूजी‚ एक रूपया दे दो न !”
उनकी इन बातों से दयार्द होकर कई युवक उसे एक—एक रूपया दे दिये।
गाड़ी अपनी रफ़्तार से नदी, गाँव, पेड़, खेत, को पीछे छोड़ती जा रही थी।
मियाँजी—“अपनी माँ और भाई को लेते आओ, मेरे पास बहुत काम है, काम करना और अपना उचित मज़दूरी लेना। क्यों गुलफ़ाम की अम्मा क्या कहती हो ?”
दोनों बेगमें अंदर ही अंदर कुढ़ के रह गयी, कुछ बोली नहीं। गुलफ़ाम अम्मा की गोद से ट्रेन के जीवन को कुतूहल भरी आँखों से देख रहा था।
बालक भिखारी चलता बना। समझ गया‚ बातों के सिवा यहाँ कुछ मिलने वाला नहीं है।
मैं ऊपर के सीट पर लेटा‚ देख रहा था। फेरीवाली सबसे हँसकर मुस्कुराती हुई स्वेटर और साल दिखा रही थी, दाम तय कर रही थी और नपे—तूले शब्दों में उनकी विशेषता बता रही थी। पाँच—छह स्वेटर बिक चुके थे। स्वेटर लेने वालों में अधिकतर रसिक नौजवान थें, जो दाम स्वेटर का नहीं, फेरीवाली के सौन्दर्य रसपान का लगाये थें। सौन्दर्य अपनी पहचान बना लेता है। रूप अपनी क़ीमत और सम्मान तय कर लेता है। वह मियाँ से बोली—“बाबूजी‚ लेना हो बताओं, देखो‚ आपके सामने दो—दो सौ के स्वेटर बेच रही हूँ ।”
एक महाशय—“ले लीजिए मौलाना साहब ! गर्म और मुलायम है, बाहर में यही पाँच सौ के नीचे न मिलेगा।” मियाँजी की बुज़ुर्गसाल आँखें सब देख और समझ रही थी। उनके साथ में अपनी दो—दो बीबियाँ‚ पहली की उम्र चालीस साल और दूसरी की यही कोई तीस साल होगी। दोनों बेगमें पूरे शरीर को बुरका से ढँकी थी‚ पर मुँह खूला था। सौन्दर्य यहाँ भी आसन जमाये बैठा था। यहाँ रसिकों का जमावड़ा उन्हें अच्छा न लगा, पराभूत होकर रूखाई से बोले—“अपनी चादर देखकर ही पाँव फैलाना चाहिए। इससे अधिक देने की शक्ति मुझमें नही है।”
फेरीवाली सुन्दर, गोरी, लम्बी थी। काली आँखें, लम्बे घने बाल, आँखों में काजल, होठों पर हल्की लाली‚ कान में तीन छेद और तीनों में सोने का रिंग लगा था। खुले बाज़ू पर पश्चिमि गोदना, माँग में सिन्दूर और गले में मंगल-सूत्र न होने से विवाहिता होना या न होना विवादास्पद था। खुले गले का शलवार—सुट पहने, गले में दुपट्टा लपेटे गज़ब़ की कहर ढा रही थी। उसके बात करने का तरीक़ा ही कुछ ऐसा था कि सभी मोहित हो जाते। उससे बातें कर अपने को धन्य मानते।
उसी समय ताली बजाते हिजड़ों (किन्नरों) का एक झुंड आया। वे सबसे दस—दस, बीस—बीस रूपया माँगते। माँगते क्या‚ ज़बरदस्ती लेते थे। कोई मज़बूरीवश देता, कोई ख़ुशी से, मियाँ का भी बीस रूपयें का बट्टा लग गया। उनकी उजड्डपन के आगे इनकी एक न चली। उनके चले जाने के बाद मियाँ देर तक बड़बड़ाते रहे—रेल प्रशासन, रेलवे पुलिस और व्यवस्था को जी!भर के कोसने के बाद बोले—“जनानियाँ न होती तो एक कौड़ी न देता। उन्हें अपनी इज़्ज़त का ख़्याल चाहे न हो‚ किन्तु हमें तो रखना ही पड़ेगा।”
आंतरिक ख़ुशी के साथ फेरीवाली बोली—“जो अपने मेहनत से सिर और पीठ पर बोझ ढोकर कमाता है‚ उन्हें लोग नहीं देते, तब एक—एक रूपया के लिए घण्टों हुज़्ज़त करते हैं। यहाँ देखों‚ लोग कितनी ख़ुशी से फटाफट पैसे निकाल रहे हैं।”
वहाँ खड़ा एक युवक बोला—“उनसे कौन रार मोल ले ! उनके आगे—पीछे रोने वाला कौन बैठा है। किसी से उलझ जाए, तो जान के लाले पड़ जाए। प्रशासन भी उनका कुछ नहीं कर सकता। हम दूर-दराज से आ रहे है, दस-बीस रूपयों के लिए लड़ने लगे तो काम नहीं चलेगा।”
फेरीवाली पैसे गिनकर बटुये में रखकर उसे खुले गले के रास्ते सूट के अंदर रखती हुई बोली—“आपको नहीं पता बाबूजी‚ हम सिपाही को देती हैं, टी0टी0 को देती हैं, कोई अधिकारी अफ़सर आ गया तो वह भी लिये बिना नहीं रहता। सब ले दे कर हमारा क्या बचता है, वाहे गुरू सब जानता है। किसी तरह नमक रोटी चल रही है। सारा दिन ट्रेन में निकल जाता है, झोला ढोते—ढोते, हाथ और कंधे लाल हो जाते हैं। बिक्री हुई या नहीं‚ नज़राना पहले पेश कर दो। जिस दिन फाका गया‚ घर से भरना पड़ता है।”
मियाँ की पहली बेगम बोली—“बताती क्यों नहीं कि आज नहीं बिका ?”
फेरीवाली मुँह पर हाथ रखती हुई—“हाय दईया, तब तो ग़ज़ब़ हो जाएगा बेगम साहिबा, कल से प्लेटफार्म पर पाँव रखना दुश्वार हो जाएगा। इनको एक मेरे न रहने से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, मेरी जगह कोई दूसरी आ जाएगी। किन्तु मैं क्या करूँगी ? मेरा घर—परिवार कैसे चलेगा ?”
मियाँ की दूसरी बेगम पान लगाती हुई—“क्यों बहन, आपके पति नहीं है, क्या वे कुछ नहीं करते ?”
“हैं बीबीजी, पहले बहुत हट्ठे—कट्ठे थे; किन्तु अब दूबले हो गये हैं। जितना कमाते‚ सब दारू और जुआ की भेंट चढ़ जाता। उन्हीं की कमाई से पहले मौज करती थी‚ कितनी चीज़े बनवा ली थी, पैसे की कभी तंगी न हुई थी। किन्तु धीरे—धीरे एक—एक कर अपने पैसे का बनाया हर चीज़ उन्होंने बेच दिया। और अब एक छोटे से मकान के सिवा और कुछ न रहा। सभी समझा कर हार गये, मगर यह लत नहीं छूटती। मुझसे जितना कुछ हुआ सब कर के देख लिया। अब एक कमरे में वे रहते हैं, दूसरे में मैं, मेरी सास और मेरा पाँच साल का बेटा। मैं अपनी कमाई से अपना, सास का, और बच्चे का परवरिश कर लेती हूँ।”
बड़ी बेगम‚ मियाँ और छोटी बेगम को पान देने के बाद फेरीवाली की तरफ़ बढ़ायी।
फेरीवाली ने धन्यवाद के साथ इनकार करते हुए कहा—“बीबीजी घर से चलते समय पान खा ली थी‚ अब गुटखा का समय हो गया है।” गुटखा निकालकर फाड़ती हुई बोली—“यही एक बुरी लत लग गयी है बीबीजी। ट्रेन की संगत ही ऐसा है कि क्या करूँ। कितना चाहती हूँ कि छोड़ दूँ पर खाये बिना कल नहीं पड़ता। जानती हूँ‚ इससे कोई फ़ायदा नहीं नुकसान ही है; पर लत से मज़बूर हूँ।” तभी उसका फोन बजा‚ सूट के अंदर से हाथ डालकर फोन निकाली और बात करने लगी। बात ख़त्म होते ही बोली—“यह मेरे पड़ोस में रहती है। पति को कैंसर है। डॅाक्टर कहता है कि चंद दिनों का और मेहमान है। खेत, ज्वेरात, जामा—जाथा सब हड़प कर गया और अब साला कहता है कि नहीं बचेगा। इन डॅाक्टरों को मरने के बाद दोजख़ नसीब होगा। दूसरा कोई घर में कमाने वाला नहीं है, सो अपने साथ इसे भी ले लिया।”
छोटी बेगम पान चबाती हुई—“लाओं वो स्वेटर मुझे दे दो। मैं दो सौ रूपये देती हूँ।”
मियाँ जी मन ही मन पत्नी की मूर्खता और फेरीवाली की वाक् चातुर्य पर हँस रहे थे। किन्तु कुछ बोले नहीं। पत्नी की ओर उपहास भाव से देखे। सारे सोहदे जा चुके थे।
फेरीवाली गुटखा का पीक चलती ट्रेन की खिड़की से बाहर थूककर स्वेटर देती हुई बोली—“बीबीजी‚ औरतें मज़बूरीवश घर से बाहर निकलती हैं । हम जानती हैं, हजारों नज़रें हमें घूरती हैं, पुलिसवाले और अधिकारियों का व्यवहार भी छिछोरा होता है। किन्तु हम क्या करें ! इस देश में नेता चाहे हजारों करोड़ गबन करे, पूँजीपति अरबों रूपये लेकर भाग जाये‚ उनका कुछ नहीं हो सकता, लाखों पुलिस और हजारों मलेटरी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकतें। किन्तु हमें दस—बीस हजार लोन देना हो तो इतना पूछताछ, इतनी लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है कि जी उब जाता है। मानो हम चोर हैं। नज़र—नज़राना अलग से, उनके बिना काम ही नहीं बनता। सम्पत्ति देखाइये, तब लोन मिलेगा अन्यथा नहीं। मैं पूछती हूँ जब सम्पत्ति ही होती तो कर्ज़ क्यों लेती, तब से मैं बैंक के नज़दीक नहीं गयी। लालाजी की मेहरबानी है कि सामान दे देते हैं, बेच के उनका पैसा अदा कर देती हूँ।”
बड़ी बेगम—“कोई दूसरा व्यवसाय क्यों नहीं कर लेती, जिसमें इज़्ज़त और मान हो, छिछोरापन्न और उजड्डपन न हो, भाग—दौड़ न हो। सरकार की कितनी ही योजनाएँ औरतों के लिए है‚ उनका फ़ायदा क्यों नहीं लेती ?”
“कहाँ की बात करती है बीबीजी‚ यह सब राजनीतिक नेताओं के भाषण की बातें है या महज़ कोरा काग़ज़ी कारवाई। यह सब करके मैं थक गई। जब कोई उपाय नज़र न आयी‚ तब यह व्यवसाय अपनायी। बेगम साहिबा‚ यही सोचकर बैंक में गयी थी कि लोन लेकर दुकान खोल दूँ, किन्तु उन्होंने इतना परेशान किया कि दूबारा उधर जाने की हिम्मत न पड़ी। घर में बैठने से पेट नहीं भरता बीबीजी। दुनिया में आयी हूँ तो हाथ—पैर चलाना ही पड़ेगा। ख़ुदा ने मुँह और पेट दिया है तो हाथ और पैर भी दिया है। जब अपने परिश्रम से कमा सकती हूँ तो दूसरों के सामने हाथ क्यों फैलाऊँ ? जब समर्थ न रहेगा और बच्चें दुत्कार देंगे‚ तब की नहीं कह सकती।” यह कहती हुई भारी और दुःखी मन से बैग कन्धे में लटकाई और नमूने के तौर पर दो—चार स्वेटर और साल हाथों में लिए गिने—गिनाये शब्दों को दोहराती आगे बढ़ गयी। उसके मन का बोझ कंधे के बोझ से कई गूना भरी था।
चले जाने के बाद महाशय बोले—“बातें बनाकर चूना लगा गयी। आप समझती हो ख़ुदा का सारा इल्म मेरे ही पाले पड़ा है। देखा, बातों में फंसाकर कैसे पैसे निकाल ले गयी। यह सब बहुत चालू होती है‚ कौन किस तरह फंसेगा इसका उन्हें ख़ूब तजर्बा है।”
बेगमों ने ऐसे मुँह बनाया, मानों उनकी बकवास उन्हें नहीं सुननी और पीक थूकती हुई दोनों बेगमें खिड़की से बाहर ताकने लगी। लौह पथ गामी यान अपनी रफ्तार में चली जा रही थी ।
कई रसिक युवक फेरीवाली के पीछे गयें। वे उसके नवयौवन, शारीरिक गठन, रूप-लावण्य, हाव-भाव, चित्त की प्रसन्नता, हास्य—विलास, विचारों का खुलापन और सौन्दर्य पर मुग्ध थे किंतु उसकी मुख की मलिनता और नैराश्य, उसके अंतर्नाद में उठती वेदना के ज्वालामुखी को, विवशता और सतीत्व को किसी ने न देखा।

धर्मेन्द्र कुमार

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu