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दिवाली

By | 2018-01-20T17:07:49+00:00 November 13th, 2015|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

मिट्टी के दिये, रुई की बाती

बचपन की यादें मन में बस जातीं |

नन्हें घरौंदें, गुड़िया इतराती |

खील-बताशे, रोली और चन्दन

फूलों की माला आँगन महकती |

संध्या की पूजा, लक्ष्मी की मूरत

अम्मा के चेहरे में घुलमिल सी जाती |

नेह की आभा, ममता से झिलमिल

वैसी दिवाली फिर क्यों ना आती

– सीमा मेहरोत्रा ( साभार दैनिक जागरण )

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