जुलाहे की चतुराई

जुलाहे की चतुराई

By | 2018-01-20T17:07:50+00:00 November 12th, 2015|Categories: पंचतन्त्र|Tags: , |0 Comments

बहुत समय पहले किसी नगर में एक जुलाहा और एक बढ़ई रहते थे | उन दोनों में गहरी दोस्ती थी | एक बार वहां देव-मंदिर का यात्रा महोत्सव हुआ, जिसमें देश-विदेश के अनेक प्रकार के लोग आए | उनमें नट-नर्तक और चारण आदि भी थे | जुलाहा और बढ़ई भी उत्सव देखने गए | वहां उन्होंने मेले में हथिनी पार सवार एक सुन्दर राजकुमारी को देखा जो अपने अंगरक्षकों और चोवदारों के साथ देव-दर्शन के लिए आई हुई थी | उसे देखकर जुलाहा उस पर मुग्ध हो गया और बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा | उसका मित्र बढ़ई उसकी यह हालत देखकर बहुत दुःखी हुआ और उसे घर ले जाकर उसका इलाज करवाया |

जब जुलाहा होश में आया तो उसके बढ़ई मित्र ने उससे पूछा- “मित्र, तुम इस प्रकार अचानक बेसुध क्यों हो गए थे ? तुम अपने दुःख का कारण बताओ मैं उसे दूर करने का प्रयत्न करूँगा |”

जुलाहे ने अपनी मनोकथा अपने मित्र को बता दी, लेकिन साथ ही यह भी बता दिया की वह उस राजकन्या को किसी प्रकार प्राप्त नहीं कार सकता | अतः वह उसके क्रिया-क्रम का इन्तजाम भी कर ले |

यह सुनकर बढ़ई ने उसे आश्वस्त किया और बोला- “मित्र, तुम्हें इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं है | मैं आज रात ही तुम्हारा राजकुमारी के साथ संगम कर सकता हूँ |”

यह सुनकर जुलाहा बोला – “मित्र, जिस राजभवन के अन्तःपुर में हवा का झोंका भी नहीं घुस सकता, वहां पहरेदारों के होते हुए मैं कैसे पहुँच सकूँगा ?”

बढ़ई बोला- “कह दिया न, करा दूंगा | बस तुम मेरी बुद्धि का चमत्कार देखते जाओ |” यह कहकर उसने एक हलकी लकड़ी से एक गरुड़ का निर्माण किया, जो एक कील से संचालित होता था | उसने भुजाएं, शंख, गदा, चक्र, पद्म, किरीट और कौस्तुम आदि भी बनाये | विष्णु के इन सब चिन्हों से जुलाहे को सजाकर गरुड़ पर चढ़ा दिया | उसे कील से गरुड़ को उड़ाने का उपाय भी बता दिया और कहा- “तुम विष्णु के रूप में राजकन्या के अन्तःपुर में जाओ और उससे प्रेम करो |”

जुलाहे ने वैसा ही किया और आधी रात को राजकन्या के पास पहुँच कर पुकारा- “राजकुमारी तुम सो रही हो या जाग रही हो ? मैं क्षीर-सागर में लक्ष्मी का संग छोड़कर तुम्हारे पास आया हूँ | उठो और मेरा प्रेम स्वीकार करो |”

विष्णु रूपधारी जुलाहे को देखकर राजकुमारी चौंक कर पलंग से उठ गई और विनम्रतापूर्वक बोली- “भगवन, मैं मानवजाति की एक साधारण-सी कन्या हूँ, और आपका सम्बन्ध कहाँ तक उचित है ?”

विष्णु रूपधारी जुलाहे को देखकर ने कहा- “तुम ठीक कहती हो राजकन्या! लेकिन तुम गोकुल में उत्पन्न राधा नाम की मेरी पहली पत्नी हो | तुमने यहाँ मनुष्य योनी में जन्म लिया है | इसलिए मैं यहाँ चला आया हूँ |”

यह सुनकर राजकुमारी बोली- “प्रभु! यदि यह सच है तो आप मेरे पिता से निवेदन कीजिये | वे आपकी बात अवश्य मानेगें |”

यह सुनकर नकली विष्णु ने कहा- “मैं मनुष्यों की दृष्टि  में नहीं आ सकता, अतः तुम मुझसे गन्धर्व विवाह कर लो, यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं तुम्हारे पिता को शाप देकर भस्म न कर दें इसलिए उसने उसको आत्म समर्पण कर दिया | तब उस विष्णु बने जुलाहे ने राजकुमारी के साथ अपनी मनमानी कर ली | इस प्रकार जुलाहा हर रात विष्णु का रूप धारण कर राजकुमारी के अन्तःपुर में आता और प्रातःकाल चला जाता |

राजकुमारी के व्यवहार में इससे परिवर्तन आने लगा | यह देखकर अन्तःपुर में काम करने वाले पहरेदारों को संदेह हुआ | उन्होंने आपस में सलाह की और राजा से जाकर पार्थना की- “महराज, यद्यपि हम लोगो को कुछ पता नहीं चल पाता, लेकिन यह निश्चित है की राजकुमारी के कक्ष में रात को कोई आता अवश्य है |”

यह सुनकर राजा सोचने लगा कि कन्या का पिता होना कष्ट का कारण है | नदियों और नारियों का स्वभाव एक-सा होता है | नदियों का जल-प्रवाह दोनों किनारों को गिरता रहता है और नारियों के दोष पिता और पति दोनों ही कुलों को हानि पहुचातें हैं |

राजा ने इस विषय में रानी को बताया तो उसे भी चिंता होने लगी | वह तुरंत राजकुमारी के पास पहुंची, और जब देखा की उसकी पुत्री की मुखाकृति महाराज के कथन की पुष्टि करती है तो क्रोधित होकर अपनी पुत्री से बोली- “अरी कुलकंलकिनी तुमने यह क्या करना आरम्भ कर दिया है | कौन है वह जो मेरे अन्तःपुर में प्रवेश करता है ?”

राजकुमारी बोली- “माँ! साक्षात विष्णु ही प्रतिदिन रात को गरुड़ पर सवार होकर मेरे कक्ष में आते हैं | यदि आपको मेरी बात पर विश्वाश न हो तो तुम आज रात छिप कर अपनी आँखों से विष्णु जी को देख सकती हैं |”

यह सुनकर रानी आश्चर्यचकित हो गयी | उसने राजा से जाकर कहा- “महाराज,  आप तो बड़े सौभाग्यशाली हैं! आपकी पुत्री से प्रेम करने के लिए साक्षात नारायण आते हैं | उन्होंने हमारी पुत्री के साथ गन्धर्व-विवाह कर लिया है | वे ही प्रतिदिन रात को उसके पास आते हैं | आज रात हम दोनों छिपकर उनकी बातें सुनेंगे क्योंकि वे मनुष्यों से बातें नहीं करते |”

उस रात राजा-रानी छिपकर बैठ गए | उन्होंने गरुड़ पर चढ़कर आए विष्णु रूपी जुलाहे के दर्शन किये | राजा प्रसन्न और भाव-विभोर होकर रानी से बोला- “प्रिये! अब तो हमारी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाएँगी | अब हमारे दामाद स्वयं नारायण हैं, तब तो सारी धरती पर मैं अपना अधिकार कर लूँगा |”

यह निश्चय करके राजा ने सीमावर्ती देशों का अतिक्रमण करना शुरू कर दिया | तब राजा ने रानी से कहा- “महारानी, राजकुमारी से कहो कि वह भगवान नारायण से इस लड़ाई में सहयोग दिलायें, ताकि हमारे शत्रुओं का नाश हो |”

रानी ने जाकर राजकुमारी से कहा- “बेटी, तुम जैसी कन्या और भगवान नारायण जैसे जामाता के होते हुए हम पर पड़ोसी देशों के राजा आक्रमण कर रहे हैं | तुम आज रात को भगवान से इस विषय में निवेदन करना और कहना की वे तुरंत अपनी दैवी शक्ति से हमारे शत्रुओं का विनाश करें |”

रात्री को जब विष्णुरुपी जुलाहा राजकुमारी के पास आया, तब उसने उनसे पार्थना की इस युद्ध में शत्रुओं का नाश करके वे उसके पिता को विजय दिलायें |

तब विष्णु रूपी जुलाहे ने कहा- “तुम चिंता मात करो | तुम्हारे पिता के शत्रुओं की संख्या कितनी भी क्यों न हो, मैं जिस दिन चाहूँगा, अपने सुदर्शन चक्र से उन सबका विनाश कर दूंगा |”

इसका परिमाण यह हुआ कि कुछ ही दिनों में राजा के शत्रुओं ने उसके सारे प्रदेश पर अधिकार कर लिया | अब केवल किला ही शेष रह गया था | राजा प्रतिदिन हर प्रकार के पूजा और सत्कार की सामग्री के साथ अपनी पुत्री द्वारा उस विष्णुरूपी जुलाहे को नया सन्देश भिजवाता | जब धीरे-धीरे सेना और शक्ति का विनाश हो गया, तब जुलाहे ने सोचा की अगर शत्रुओं का किले पर भी अधिकार हो गया तो मैं राजकन्या से कभी नहीं मिल पाऊंगा | इसलिए गरुड़ पर चढ़कर शंख, चक्र, गदा, पद्म के साथ मुझे आकाश में उड़ जाना चाहिए | संभव हो की लोग मुझे विष्णु समझ कर डर जाएँ | अगर इस काम में मेरी मृत्यु भी हो जाए तो बुरा नहीं है क्योंकि गाय के लिए, ब्राह्मण के लिए, अपने स्वामी या अपनी स्त्री के लिए, और देश की रक्षा के लिए जो युद्ध करता हुआ प्राणों को त्यागता है, उसे स्वर्ग मिलता है |

यह विचार कार उसने राजकुमारी से कहा- “सुनो राजकुमारी! अब मैं सभी शत्रुओं का नाश करूँगा | जब तक उनका नाश नहीं हो जाएगा, तब तक न पानी पिऊंगा, न भोजन करूँगा | तुम अपने पिता से कह दो की अपनी आधी से अधिक सेना लेकर मैदान में लड़ने आ जाएँ | मैं आकाश में रह कर शत्रुओं के तेज और बल का नाश कर दूंगा | अगर मैं शत्रुओं को अपने हाथ से मरूँगा तो उनको स्वर्ग मिल जाएगा |

इसलिए जब वे मेरे प्रभाव से डर कर भागने लगें तो तुम्हारे पिता को चाहिए कि अपनी सेना से उन्हें मरवा डालें |” यह कह कर विष्णु रूपी जुलाहा वहां से चला गया |

प्रातःकाल होते ही राजकुमारी ने अपने माता-पिता को सारी बात बता दी | यह सुनकर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ | वह अपनी सेना लेकर शत्रुओं के विनाश के लिए निकल पड़ा | उधर वह जुलाहा भी अपना अंत जानकार अपने लकड़ी के गरुड़ पर सवार होकर युद्धस्थल की ओर चल पड़ा |

इधर देवलोक में भगवान विष्णु ने अपने वाहन पक्षीराज गरुड़ से पूछा- “पक्षीराज, क्या तुम्हें पता है कि जुलाहा मेरा रूप धारण करके लकड़ी के गरुड़ पार सवार होकर राजकुमारी से प्रेम करता है ?”

गरुड़ बोला- “ जनता हूँ प्रभु! लेकिन अब किया भी क्या जा सकता है ?”

भगवान विष्णु बोले- “आज वह जुलाहा मरने का निश्चय करके युद्धक्षेत्र में आ गया है | यदि वह मारा गया तो लोगों में हमारी प्रतिष्ठा भंग हो जाएगी | हमारी कोई उपासना नहीं करेगा | अतः तुम तुरंत वहां जाकर जुलाहे के लकड़ी के गरुड़ में प्रवेश करो | चक्र भी उसके चक्र में प्रविष्ट हो जायेगा और मैं जुलाहे के शरीर में प्रविष्ट हो जाऊंगा | जिससे शत्रुओं का विनाश हो सकेगा | उसके शत्रुओं के वध से हमारी महिमा बढ़ जाएगी |”

भगवान विष्णु और गरुड़ के इस प्रकार करने से उस जुलाहे और राजा की लड़ाई में जीत हो गई | उसके शत्रुओं का नाश हो गया | फिर सर्वत्र यह चर्चा फैल गई कि राजा ने अपने विष्णु रूपी जामाता की मदद से सभी शत्रुओं को नष्ट कर दिया |

जुलाहा बहुत प्रसन्न था | जब वह अपने वास्तविक रूप में राजा के सामने प्रकट हुआ, तब राजा ने उससे सारी बात पूछी | जुलाहे ने सारी बात सच-सच बता दी | राजा जुलाहे की चतुराई और उसके साहस से बहुत प्रसन्न हुआ | उसने राजकुमारी का विधिपूर्वक उससे विवाह कर दिया | तब जुलाहा राजकुमारी के साथ आराम से अपना जीवन व्यतीत करने लगा |

यह कथा सुनकर करटक ने कहा- “ यह सब तो ठीक है, लेकिन संजीवक बैल होने पार भी बुद्धिमानी प्राणी है | उधर पिंगलक भी अत्यंत क्रोधी है | यह ठीक कि तुम्हारी बुद्धि प्रखर है, फिर भी तुम इन दोनों को अलग करने में कैसे समर्थ ओ पाओगे ?”

दमनक बोला- “भाई असमर्थ होते हुए भी मैं समर्थ हूँ | जो काम उपाय से पूरा किया जा सकता है, वह प्रक्रम से पूरा नहीं होता, जैसे कौए की पत्नी ने सोने का कंठहार के सूत्र से एक विषधर सर्प का अंत कर दिया था |”

करटक ने पूछा- “वह कैसे भाई ?”

दमनक बोला- “सुनाता हूँ सुनो | यह कहकर दमनक ने करटक को यह कथा सुनाई |

लेखक – विष्णु शर्मा

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