मन की शक्ति

मन की शक्ति

By | 2018-01-20T17:08:54+00:00 April 6th, 2016|Categories: बाल मन|Tags: |0 Comments

सिर्फ मनुष्य में ही विचार की एक ऐसी शक्ति है , जिसको काम में लाने से वह अपना उद्धार कर सकता है । मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु । हमारे भौतिक शरीर के साथ – साथ हमारे मानसिक शरीर की भी सत्ता होती है , जिसे ‘ मन ‘ कहते है । ‘ मन ‘ को अंग्रेजी में ‘ माइंड ‘ तथा उर्दू में ‘ जहन ‘ कहते है । ‘ मन ‘ ही हमारे भौतिक शरीर को संचालित करता है । मन की शक्ति असीम और अदभुत है । हमारी सफलता और असफलता का श्रेय ‘ मन की शक्ति ‘ को ही जाता है । क्योकि —
“मन के हारे , हार है ।
मन के जीते , जीत । ”
हमारे मन की शक्ति उसमें उठने वाले विचारों , संकल्पों और आत्मविश्वास पर निर्भर करती है । व्यक्ति जैसा सोचता है , वस्तुत : वह वैसा ही बन जाता है । गीता में कहा गया है — ‘ यो यच्छ्द : स एव स : ‘ अर्थात जो अपने सम्बन्ध में जैसी श्रद्धा रखता है ,
वस्तुत : वैसा ही होता है । इसलिए हमें अपने मन में सदैव सकारात्मक विचारों को बनाए रखना चाहिए तथा नकारात्मक विचारों से बचना चाहिए । इसके लिए आवश्यक है — अपने आप पर विश्वास अर्थात आत्मविश्वास । क्योंकि — ” बदला जाये दृष्टिकोड तो इंसान बदल जाता है ” । हमें अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए आशान्वित होना चाहिए । ऐसा हमारे मन के सकारात्मक विचारों से ही संभव है ।
विद्यार्थी जीवन में तो मन की शक्ति के सदुपयोग का महत्व और बढ़ जाता है । विद्यार्थी को अपने मन की शक्ति रचनात्मक कार्यो में लगानी चाहिए । यह तभी संभव है जब विद्यार्थी मन की चंचलता को नियन्त्रित करके एकागर्ता में परिवर्तित करे ताकि वह विद्यार्थी जीवन के लक्ष्यों की ओर सफलतापूर्वक बढ़ता रहे । किसी शायर ने कहा है —
क़दम चुम लेती है खुद बढ़के मंज़िल ,
मुसाफ़िर अगर अपनी हिम्मत ना हारे ।

– राधेश्याम शर्मा

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