सुलझे गाँठ

सुलझे गाँठ

By | 2018-01-20T17:08:53+00:00 April 14th, 2016|Categories: विचार|Tags: |0 Comments

प्रेम का धागा नहीं टूटता ….. जब तक उसमें शक का दीमक या अविश्वास का घुन ना जुड़ता ….. खोखला होगा तभी तो टूटेगा

मैं जब कढ़ाई या बुनाई करती हूँ …… तो जब गाँठ डालना होता है ….. गाँठ डालना होगा न … क्योंकि लम्बे धागे उलझते हैं और उलझाव से धुनते धुनते कमजोर भी होने लगते हैं ……. और ऊन का 25 या 50 ग्राम का गोला होता है ….. 400 से 600 ग्राम का गोला तो मिलता नहीं ना …..
—- जहाँ खत्म हुआ सिरा और शुरू होने वाला सिरा के पास थोड़ा थोड़ा उधेड़ती हूँ फिर दोनों के दो दो छोर हो चार छोर हो जाते हैं …. दो दो छोर सामने से मिला बाट लेती हूँ …… फिर गाँठ का पता नहीं चलता है …… क्या रिश्ते के गाँठ को यूँ नहीं छुपाया जा सकता है ….. कुछ कुछ छोर तक उधेड़ डालो न मन को ….. जहाँ से केवल प्रेम का सिरा दिखे ….. हर गाँठ से रफ़ू तक संवारो जिंदगी ….. यूँ ही तो चलती ही जाती है जिन्दगी ….

– विभा रानी श्रीवास्तव

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