स्त्री अधिकार का प्रश्न और मलाला का संघर्ष

स्त्री अधिकार का प्रश्न और मलाला का संघर्ष

By | 2018-01-20T17:08:50+00:00 April 17th, 2016|Categories: विचार|Tags: |0 Comments

शिक्षा के लिए लड़कर अपनी जान तक की बाजी लगा देने वाली मलाला यूसुफजई का जन्म 12 जुलाई 1997 में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के स्वात जिले में स्थित मिगोरा शहर में हुआ था। मलाला के पिता का नाम जियाउद्दीन यूसुफजई है, तालिबान ने 2007 से मई 2009 तक स्वात घाटी पर कब्जा कर रखा था, और इसी कारण तालिबान के डर से लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया था।उन्हीं लड़कियों में से एक लड़की मलाला भी थी। उस समय मलाला आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। और तभी से मलाला के जीवन का संघर्ष शुरू हो जाता है।
कभी किसी ने सोचा भी नहीं था कि ये लड़की बड़ी होकर एक दिन महिलाओं और मासूम बच्चों की आवाज बनेगी। मिगोरा में स्वात घाटी को वहाँ का स्विटजरलैंड माना जाता है। पर 2007 से ही वहाँ पर तालिबान ने अपना कब्जा जमा रखा और वहाँ की मासूम लड़कियों पर स्कूल जाने और टी वी देखने पर पाबंदी लगा दी। मासूम बच्ची मलाला को पढ़ाई करना और स्कूल जाना बहुत पसंद था। इसीलिए उसने बी.बी.सी की उर्दू सेवा के लिए अपने पद नाम (गुल मकई) के नाम से एक डायरी लिखी’डायरी आॅफ ए पाकिस्तानी स्कूल गर्ल’। इस शीर्षक से ब्लाॅग लिखना शुरू कर दिया। जिसमें उसने स्वात में तालिबान के कुकृत्यों का वर्णन किया था। इस ब्लाॅग को सभी लोग पसंद करने लगे। इसके माध्यम से मलाला ने लोगों को ना ही सिर्फ जागरूक किया बल्कि तालिबान के खिलाफ खड़ा भी कर दिया। मलाला ने इतनी कम उम्र से ही तालिबान के फरमान के बावजूद लड़कियों को शिक्षित करने का अभियान चला दिया। शिक्षा के लिए दृढ़ता से प्रज्वलित इस ज्योति को अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में बढ़ावा देने व साहसी और उत्कृष्ट सेवाओं के लिए पहली बार 19 दिसंबर 2011 के दिन पाकिस्तान सरकार द्वारा मालाला को “राष्ट्रीय शांति पुरुस्कार” से नवाजा गया। इस समय तक मलाला बहुत हद तक लोकप्रिय हो चली थी।
अफगानिस्तान से लगी स्वात घाटी की 11 साल की मलाला ने तालिबान के खिलाफ भाषण दिया और उस भाषण में यह कहकर विरोध का बिगुल बजाया था कि ‘कोई मुझसे मेरा शिक्षा का मूल अधिकार कैसे छीन सकता है? पाकिस्तान में महिलाओं की शिक्षा के लिए आवाज उठाने वाली इस मासूम सी मानवाधिकार कार्यकर्ता को अंततः चरमपंथियों के आतंकवाद का शिकार बनना पड़ा। 9 अक्टूबर 2012 को मलाला स्कूल से अपने साथियों के साथ स्कूल बस से जब लौट रही थी तभी आतंकियों ने बस रोककर मलाला पर हमला किया। आतंकियों की गोली उसके आँख के ऊपर से आर-पार हो गई। गंभीर रूप से घायल मलाला को इलाज के लिए ब्रिटेन ले जाया गया। जहाँ उन्हें क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया। देश – विदेश में मलाला के स्वस्थ्थ होने की प्रार्थना की गई और आखिरकार मलाला वहाँ से स्वस्थ्थ होकर लौटी। तब तक मलाला पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो चुकी थी और उसे मैक्सिको में इक्विेलिटी और नाॅन डिस्क्रिमिनेशन का ‘अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार’ और संयुक्त राष्ट्र ने भी ‘मानवाधिकार सम्मान'(ह्यूमन राइट अवार्ड) से नवाजा।
मलाला पर तालिबानी हमले के बाद उनके स्कूल के एक टीचर ने बातचीत के दौरान बताया था कि मलाला जब मात्र ढ़ाई साल की थी तभी से अपने पिता के स्कूल में अपने से 10 साल बड़े बच्चों के साथ बैठा करती थी। वो बोलती कुछ नहीं थी बस टुकुर- टुकुर सब कुछ देखा करती थी। स्वात घाटी में अपने स्कूली जीवन के दौरान मलाला हमेशा अपनी कक्षा में फस्र्ट करती थी। वह एक विलक्षण प्रतिभा की धनी साधारण सी दिखने वाली लड़की थी जिसे कभी इस बात का अनुमान नहीं था कि वो इतनी खास बन जाएंगी।
मलाला यूसुफजई की डायरी और उनके बेवाक जज्बे ने उन्हें पाकिस्तान में मशहूर और तालिबान की गले की हड्डी बना दिया। हमले ने मलाला की हिम्मत को तोड़ने के बजाए उसे दुनिया भर का जाना माना नाम बना दिया। हमले के साथ ही सोशल नेटवर्किग साइट्स से लेकर गलियों और चैराहों पर उनकी हिम्मत के चर्चे होने लगे और लोगों ने हमले की आलोचना भी की। स्वात घाटी से निकली एक 11 साल की बच्ची की आवाज अब लगता है सिर्फ अकेले उसकी नहीं रही। तालिबान के खिलाफ सिर उठाने वाली इस बच्ची की आवाज ने दुनिया भर में चार दीवारियों के भीतर दबी सहमी लडकियों को शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ने की हिम्मत दे डाली।
मलाला ने स्वयं यह बात कहा है कि मुझपर हमला होने के कई महीने पहले से ही उसे धमकिया मिल रहीं थी। रात को मैं तब तक इंतजार करती रहती थी जब तक धर के सारे लोग सो न जाए, उसके बाद में हर दरवाजा और खिड़की चेक करती थी। मैं नहीं जानती क्यों, लेकिन मैं निशाने पर हूँ यह जानने के बाद भी मुझे डर नहीं लगा। मुझे ऐसा लगता कि हर कोई जानता है कि मुझे एक दिन मरना है। इसलिए मुझे वह करना चाहिए जो मैं चाहती हूँ।
मलाला ने तालिबान के घातक हमले के बाद अस्पताल में बिताये गये अपने दिनों का ब्यौरा इस प्रकार दी है ‘गोली लगने के एक सप्ताह बाद 16 अक्तूबर को जब मुझे होश आया, वहाँ सबसे पहले मेरे मन में विचार आया, ‘खुदा का शुक्र है, मैं मरी नहीं, मेरे मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे। मैं कहाँ हूँ? मुझे यहाँ कौन लेकर आया? मेरे माता-पिता कहाँ है? क्या मेरे पिता जीवित है? मैं डरी हुई थी। मुझे सिर्फ यही पता था कि अल्लाह ने मुझे एक नई जिंदगी से नवाजा है।’ मलाला पर गोली चलाने की घटना की निंदा पूरी दुनिया में हुई और इसके बाद मलाला की जिंदगी बदल गई। मलाला यूसुफजई से एक बार पत्रकारों ने पूछा था कि जिन्होंने उन पर हमला किया उनके बारे में वह क्या सोचती हैं। इस पर मलाला ने कहा था, मैं सोचती हूँ कि उन्हें मलाला पर हमला करने का अफसोस होगा। अब उसकी आवाज दुनिया के हर कोने में सुनी जाती है।
मलाला ने अहिंसा का पाठ गांधीजी, खान अब्दुल गफ्फार खान और मदर टेरेसा से सीखा है। मलाला पाकिस्तान में हर उस लड़की को शिक्षित करना चाहती है, जो निरक्षर है। इस उद्देश्य के लिए मलाला फंड की स्थपना की गयी है। आज मलाला एक सिलेब्रिटी बन गई है। मलाला को पाकिस्तान का पहला ‘राष्ट्रीय युवा षांति’ पुरस्कार मिला है। मलाला को ‘टाइम’ पत्रिका ने 100 सबसे प्रभावषाली व्यक्तियों में एक नामित किया। मलाला को संयुक्त राष्ट्र में संबोधित करने का मौका मिला और संयुक्त राष्ट्र ने 12 जुलाई के दिन को ‘मलाला दिवस’ घोषित किया। इस मौके पर मलाला का कहना था कि ‘एक बच्चा, एक अध्यापक, एक किताब, एक पेन इस पूरी दुनिया को बदल सकते हैं। मलाला यूसुफजई की किताब ‘आई एम मलालाः हाउ वन गर्ल स्टुड अप फाॅर एजुकेषन एंड चेंज्ड द वल्र्ड’ के आॅडियो संस्करण को 57 वें एनुअल ग्रैमी अवाड्र्स में बेस्ट चिल्ड्रन्स’ एलबम पुरस्कार से सम्मानित किया गया है अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 2010 में मिले क्षुद्र ग्रह 316201 का नामकरण मलाला के नाम पर किया है और पाकिस्तानी बैंड ने उस पर दो गाने भी बनाये हैं। इतना ही नहीं बच्चों और युवाओं के दमन के खिलाफ और सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले भारतीय समाजसेवी ‘कैलाष सत्यार्थी’ के साथ संयुक्त रूप से शांति का ‘नोबेल पुरस्कार’ भी प्रदान किया गया। दिसंबर 2014 को नाॅर्वे में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया गया और मलाला दुनिया की सबसे कम उम्र महज 17 वर्ष की आयु में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली विजेता बन गई। पुरस्कार ग्रहण करने के बाद अपने संबोधन में मलाला का कहना था “मैं जिद की हद तक प्रतिबद्धता रखने वाली इंसान हूँ और चाहती हूँ कि हर बच्चे को शिक्षा हासिल हो।” और अपने पिता को धन्यवाद देती हूँ कि उन्होंने मेरे पर नहीं कतरे, और मुझे उड़ान भरने दी…… ’’मैं अपनी माँ को भी शुक्रिया कहती हूँ कि उन्होंने मुझे सब्र रखने और हमेशा सच बोलने की प्रेरणा दी…….’’ और आगे मलाला का कहना है कि ’’मैं एक आवाज नहीं, कई आवाजें हूँ…… मैं उन छह करोड़ 60 लाख लड़कियों का रूप हूँ, जिन्हें शिक्षा नहीं मिल रही है…….. बहुत से बच्चों को शिक्षा गरीबी की वजह से नहीं मिल पाती…….मैं अपनी कहानी इसलिए नहीं सुना रही हूँ क्योंकि ये सबसे अलग है, बल्कि इसलिए सुना रही हूँ, क्योंकि यह अलग नहीं है….. यही बहुत सी लड़कियों की कहानी है।’’

– वर्षा कुमारी
शोधार्थी
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ( हैदराबाद )

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